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3.4.2026 - सोचने का ढंग

3.4.2026

आज जो संसार के लोग दुखी हैं, इसका एक बहुत बड़ा कारण यह है, कि "उन्हें सोचने का ढंग ठीक से नहीं आता। वे ठीक से सोचना नहीं जानते।"

ऐसा नहीं है, कि "लोगों के पास सुखी होने के लिए वस्तुएं न हों।" उनके पास बहुत सी वस्तुएं हैं। परंतु उनके सोचने में गलती यह है कि "जो वस्तुएं उनको प्राप्त हैं, उनका तो वे सुख लेते नहीं। और जो वस्तुएं अभी प्राप्त नहीं हो पाई, उन्हीं के बारे में सोच सोच कर दुखी होते रहते हैं," कि "मुझे यह वस्तु नहीं मिली। वह वस्तु नहीं मिली। यदि यह वस्तु मिल जाती, तो मैं पूरा सुखी हो जाता।" ऐसा सोचना गलत है।

यदि ऐसा सोचना ठीक होता, "तो जो वस्तुएं आप को मिल गई, उनसे भी तो आप पूरे सुखी नहीं हो पाए। दो-चार वस्तुएं और मिल जाएंगी, तब भी आप पूरे सुखी नहीं हो पाएंगे।" "क्योंकि भौतिक वस्तुओं में इतना सामर्थ्य है ही नहीं, कि वे आपकी सारी इच्छाओं को पूर्ण कर सकें। और इन वस्तुओं में इतना सुख भी नहीं है, जो आपको पूरी तरह से तृप्त कर दे।"

"इसलिए जो वस्तुएं नहीं मिल पाई, उनकी चिंता छोड़िए। और जितनी मिल गई, उनका लाभ उठाइए।" "यदि आप इतने में संतोष कर लेंगे, तो आप इतनी वस्तुओं में भी बहुत सुखी होकर जी सकते हैं।" अतः अपने सोचने का ढंग बदलिए। सोचने का सही ढंग यह है कि "वर्तमान में प्राप्त वस्तुओं का लाभ उठाइए, और जो नहीं मिली, उसके लिए प्रयास भले ही करें, परंतु चिंता न करें। यदि वे वस्तुएं भी मिल जाएंगी, तो आपकी सुविधा थोड़ी सी और बढ़ जाएगी, और यदि नहीं मिली, तो भी उनके बिना आप बहुत अच्छी तरह से जीवन जी सकते हैं, और जी भी रहे हैं।"

इस बात पर भी ध्यान देवें, कि "इस संसार में करोड़ों व्यक्ति ऐसे हैं, जिनके पास उतनी सुविधाएं भी नहीं हैं, जितनी आपके पास आज उपलब्ध हैं।फिर भी वे करोड़ों व्यक्ति जैसे तैसे अपना जीवन जी रहे हैं। और उनमें से वे लोग बहुत अधिक सुखी है जिन्होंने प्राप्त वस्तुओं पर संतोष कर लिया है।सुखी होने के लिए आप भी ऐसा करें।"

---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक निदेशक दर्शन योग महाविद्यालय रोजड़ गुजरात।"


 
 
 

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