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5.5.2026


कुछ लोग अपनी योजनाएं बनाते हैं, कि मुझे यह कार्य करना है। "फिर उसके लिए पुरुषार्थ भी करते हैं। उनकी अनेक योजनाएं सफल भी हो जाती हैं।"

धीरे-धीरे उनकी आयु बढ़ने लगती है, और 60/65 तक पहुंच जाती है। वे फिर और योजनाएं बनाते हैं। फिर काम करते हैं और उन्हें सफलताएं भी मिलती जाती हैं। फिर कभी-कभी ऐसा भी सोचते हैं, "अब तो मेरी आयु बहुत बढ़ गई। अब क्या योजना बनाएंगे!"

परन्तु जो लोग अभी भी काम करने में सक्षम हैं, समर्थ हैं। उनके शरीर में अभी शक्ति है और उनके पास योजनाएं भी हैं। उनमें उत्साह बुद्धिमत्ता दूरदर्शिता गंभीरता एवं अनुभव आदि अच्छे-अच्छे गुण भी हैं। तो केवल आयु बढ़ जाने के कारण निराश नहीं होना चाहिए। उन्हें सकारात्मक चिंतन करना चाहिए, कि "अभी तो मेरे पास ईश्वर की दी हुई बहुत सी शक्ति बची हुई है। अभी मैं युवा हूं। अभी तो और कई वर्ष काम कर सकता हूं।" ऐसा सोचकर पूरे उत्साह के साथ अपनी योजनाओं की पूर्ति में लगे रहें। "ईश्वर आपका उत्साह बढ़ाएगा। आपको और अधिक शक्ति देगा और आप ऐसे ही स्वस्थ प्रसन्न एवं स्वयं को युवा अनुभव करते हुए और भी बहुत से कार्य कर जाएंगे।"

आपके कार्यों को देखकर अन्यों को भी प्रेरणा मिलेगी, कि "यह व्यक्ति इस उम्र में भी इतनी भाग दौड़ करता है। पूरे उत्साह के साथ काम करता है। कहीं इसके जीवन में कमजोरी या निराशा नहीं दिखाई देती, तो हमें भी ऐसा ही करना या बनना चाहिए।"

"इस प्रकार से आपके उत्तम कार्यों को देखकर दूसरों को भी बहुत सी प्रेरणा मिलेगी। इससे उनकी एवं समाज की उन्नति तो होगी ही, साथ में आपको भी इसका बहुत बड़ा पुण्य मिलेगा।"

---- "स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात."



 
 
 

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