उपनिषद् ज्ञान गङ्गा - [भाग 3]
- kcptokyomarathon20
- May 3
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प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ
* अन्तिम उपदेश
याज्ञवल्क्य की दो स्त्रियां थीं, मैत्रेयी और कात्यायनी। मैत्रेयी को ब्रह्म सम्बन्धी विचार में रुचि थी; कात्यायनी घर के काम काज में चतुर थी। याज्ञवल्क्य की इच्छा हुई कि वे गृहस्थ को छोड़कर अगले आश्रम में प्रवेश करें।
याज्ञवल्क्य ने कहा, "मैत्रेयी! देखो, मैं चाहता हूं कि वर्तमान आश्रम को छोड़कर संन्यास ले लूं। अतएव मैं चाहता हूं कि अपनी सम्पत्ति तुम दोनों में बांट दूं।"
मैत्रेयी ने कहा, "यदि सारा संसार समस्त सम्पत्ति समेत मेरा हो, तो क्या मैं अमर हो जाऊंगी?"
याज्ञवल्क्य ने कहा, "नहीं, तुम्हारी अवस्था एक धनवान पुरुष की अवस्था हो जावेगी, परन्तु धन से कोई अमर तो नहीं हो सकता।"
मैत्रेयी ने कहा, "यदि मैं धन से अमर नहीं हो सकती, तो धन मेरे किस काम का? मुझे तो ऐसा ज्ञान दीजिये, जो मुझे अमर बना दे।"
याज्ञवल्क्य ने कहा, "तुम मुझे पहले से ही प्रिय थी, इस प्रश्न से तुमने मेरे प्रेम को और भी बढ़ा दिया है। आओ बैठो; मैं तुम्हें अमर होने के साधनों के सम्बन्ध में बताऊंगा। उसे समझने का यत्न करो।"
"पति की कामना के लिए पत्नी पति को प्यार नहीं करती, आत्मा की कामना के लिए उसे पति प्यारा होता है। पत्नी की कामना के लिए पति को पत्नी प्यारी नहीं होती, किन्तु आत्मा की कामना के लिए उसे पत्नी प्यारी होती है। पुत्रों की कामना के लिए पुत्र प्यारे नहीं होते, किन्तु आत्मा की कामना के लिए पुत्र प्यारे होते हैं। धन धन के अर्थ प्यारा नहीं होता, किन्तु आत्मा की कामना के लिए यह प्यारा होता है। ब्राह्मणत्व (ब्राह्मणपन) ब्राह्मणपन के लिए प्यारा नहीं, किन्तु आत्मा की कामना के लिए प्यारा होता है। क्षात्रत्व (शासन) क्षात्रत्व के लिए प्यारा नहीं होता, किन्तु आत्मा की कामना के लिए प्यारा होता है। परलोक (वर्तमान जीवन के उपरान्त प्राप्त होने वाली अच्छी अवस्थाएं) लोकों की कामना से प्यारे नहीं होते, किन्तु आत्मा की कामना से लोक प्यारे होते हैं। देवत्व की कामना से देव प्यारे नहीं होते, किन्तु आत्मा की कामना से देव प्यारे होते हैं। समस्त प्राणियों से प्रेम उनकी कामना से नहीं किया जाता, किन्तु आत्मा की कामना से किया जाता है। अखिल ब्रह्माण्ड ब्रह्माण्ड की कामना से प्यारा नहीं होता है, किन्तु आत्मा की कामना से प्यारा होता है।
ऐसे आत्मा को ही देखना, सुनना तथा मनन करना चाहिए। देखने, सुनने, मनन करने से जब इस आत्मा का ज्ञान होता है, तो सब कुछ समझ में आ जाता है।" [बृहदारण्यक० ४/५/१-६]
"जहां द्वैत का भाव होता है, वहां एक दूसरे को देखता है; वहां एक दूसरे को सूंघता है; वहां स्वाद लेने वाला दूसरे पदार्थ का स्वाद लेता है; वहां बोलने वाला दूसरे से बातचीत करता है; वहां सुनने वाला दूसरी वस्तु का शब्द सुनता है; वहां मनन करने वाला दूसरे पदार्थ का मनन करता है; वहां छूने वाला दूसरे पदार्थ को छूता है; वहां (उनमें किसी प्रकार से) जानने वाला किसी दूसरे पदार्थ को जानता है। परन्तु जिस पुरुष के लिये सबकुछ उसका आत्मा ही बन गया है, वह कैसे किसी वस्तु को देख सकता है? सूंघ सकता है? स्वाद ले सकता है? कुछ बोल सकता है? कुछ सुन सकता है? किसी वस्तु का मनन कर सकता है? किसी वस्तु को छू सकता है? कुछ जान सकता है?"
"मनुष्य जिस आत्मा से सब कुछ जानता है, उस आत्मा को किससे जानें? यह आत्मा 'न यह है, न वह'। (कोई विशेष पदार्थ जिसे देख, छू सकते ही नहीं हैं।) उसे पकड़ा नहीं जा सकता; उसे छिन्न-भिन्न नहीं किया जा सकता; उसे छुआ नहीं जा सकता है; उसका कोई अंग नहीं; उसे पीड़ा नहीं हो सकती; उसका नाश नहीं होता।" [बृहदारण्यक० ४/५/१५]
[एक और अर्थ में इस उपदेश को लिया जा सकता है। सम्भव है कि 'आत्मा' शब्द परमात्मा के लिए प्रयुक्त हुआ हो। इस दशा में इस उपदेश का अभिप्राय यह है कि संसार में जहां कहीं सौन्दर्य है, वह परमात्मा का प्रकाश है। जब कोई वस्तु मुझे अपनी ओर खींचती है, तो वास्तव में परमात्मा उस वस्तु के द्वारा मुझे अपनी ओर खींचता है। जितना भी क्लेश हम अनुभव करते हैं, वह परमात्मा से बिछुड़ने के कारण होता है। हमारा आत्मा इस वियोग का अन्त करना चाहता है। सुन्दर वस्तुओं का प्रेम इसका एक साधन है। जब हम किसी पदार्थ से प्रेम करते हैं, तो उस समय के लिए अपने आपको और अपनी विभिन्नता को भूल जाते हैं। अपने प्रियतम में अपने आपको तन्मय कर देते हैं। यदि समस्त पदार्थों को परमात्मा का प्रकाश समझ लिया जावे, तो समस्त प्रेम वास्तव में आत्मा का प्रेम ही हो जाता है।
याज्ञवल्क्य के उपदेश के दूसरे भाग में इसी प्रकार के परिणाम की ओर संकेत किया गया है। दुःखों का कारण यह है कि एक मनुष्य अपने आपको दूसरे पदार्थों से पृथक समझता है। उनको देखने, सुनने, छूने, जानने का यत्न करता है। जब द्वैतभाव मिट जाता है, तो इस प्रकार के ज्ञान के लिए कोई स्थान नहीं रहता; और जहां तक आत्मज्ञान का सम्बन्ध है, यह तो इन्द्रियों और मन का विषय नहीं। आत्मा जानने वाला है। इसे ज्ञान का विषय नहीं बनाया जा सकता। आँख सब वस्तुओं को देखती है, परन्तु अपने आपको नहीं देख सकती; जिह्वा सब वस्तुओं का स्वाद लेती है, परन्तु अपना स्वाद नहीं ले सकती; इसी प्रकार आत्मा जिन साधनों से दूसरे पदार्थों को जानता है, उन साधनों से अपने आपको नहीं जान सकता। यह कहा जा सकता है कि सांसारिक पदार्थों का ज्ञान इन्द्रियों से होता है, दूसरे आत्माओं का ज्ञान अनुमान से होता है, अपने आत्मा का ज्ञान स्वयं सिद्ध (Intuitive) है।]
[सन्दर्भ ग्रन्थ- जीवन ज्योति]


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