🚩‼️ओ३म्‼️🚩 | 🕉️🙏नमस्ते जी | दिनांक - ०२ मई २०२६ ईस्वी | दिन - - शनिवार
- kcptokyomarathon20
- May 3
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🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🕉️🙏नमस्ते जी
दिनांक - ०२ मई २०२६ ईस्वी
दिन - - शनिवार
🌖 तिथि-- प्रतिपदा ( २४:५९ तक तत्पश्चात द्वितीया )
🪐 नक्षत्र -- विशाखा (पूर्ण रात्री तक )
पक्ष - - कृष्ण
मास - - ज्येष्ठ
ऋतु - - ग्रीष्म
सूर्य - - उत्तरायण )
🌞 सूर्योदय - - प्रातः ५:४० पर दिल्ली में
🌞 सूर्यास्त - - सायं १८:५७ पर
🌖 चन्द्रोदय -- १९:५० पर
🌖 चन्द्रास्त - - चन्द्रास्त नही होगा
सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२७
कलयुगाब्द - - ५१२७
विक्रम संवत् - -२०८३
शक संवत् - - १९४८
दयानंदाब्द - २०२
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🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🔥 बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ।।
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जिसने मन को इच्छाओं को जीत लिया है उसके लिए मन सर्वश्रेष्ठ मित्र है, किन्तु जो ऐसा नहीं कर पाया इसके लिए मन सबसे बड़ा शत्रु बना रहेगा।
जब कोई प्रशंसा करता है, तब हमें लगता है कि सुख मिल रहा है। ओर जब कोई निंदा करता है, तब लगता है कि दुख मिल रहा है। लेकिन सुख और दुख का मूल कारण हमारे भीतर होता है वह है हमारा अहंकार। जैसे-जैसे हम सशक्त होते जाते हैं, यह जरूरी हो जाता है कि हम ज्यादा उदार हृदय और जिम्मेदार बनें, न कि प्रतिक्रियावादी या बेबस। किसी ने सही कहा है कि यदि हम जीवन को एक संभावना के रूप में देखते हैं, तो हम हर जगह संभावना ही देखेंगे। यदि हम जीवन को एक समस्या के रूप में देखते हैं, तो हर ओर हमें समस्याएं ही समस्याएं नजर आएंगी। इसलिए हमारे लिए जरूरी है कि हम समाधान का हिस्सा बनें, समस्या का नहीं।
याद रखें कामनाओं का कोई अंत नहीं होता है, हां, कामनाओं की पूर्ति करते करते व्यक्ति का अंत अवश्य हो जाता है। ऐसे में प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी इच्छाओं का दास नहीं बने, बल्कि अपनी इच्छाओं को अपना दास बनाए, तभी उसका जीवन सार्थक और खास होगा। जो अपने मन को वश में नहीं कर सकता, वह सतत अपने परम शत्रु के साथ निवास करता है और इस तरह उसका जीवन तथा लक्ष्य दोनों ही नष्ट हो जाते हैं ।
जब तक मन अविजित शत्रु बना रहता है, तब तक मनुष्य को काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि की आज्ञाओं का पालन करना होता है। किन्तु जब मन पर विजय प्राप्त हो जाती है, तो मनुष्य इच्छानुसार उस ईश्वर की आज्ञा का पालन करता है जो सब के हृदय में परमात्मा स्वरूप स्थित है।
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🕉️🚩 आज का वेद मंत्र 🕉️🚩
🌷 ओ३म् अग्ने ब्रह्म गृभ्णीष्व धरुणमस्यन्तरिक्षं दृँह ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि सजातवन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय । धर्त्रमसि दिवं दृँह ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि सजातवन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय । विश्वाभ्यस्त्वाशाभ्य उपदधामि चित स्थोर्ध्वचितो भृगूणामड़्गिरसां तपसा तप्यध्वम् ।। ( यजुर्वेद १\१८ )
💐 अर्थ ;- इस मंत्र में श्लेषालंकार है । ईश्वर का यह उपदेश है कि हे मनुष्यो ! तुम विद्वानों की उन्नति तथा मूर्खपन का नाश वा सब शत्रुओं की निवृत्ति से राज्य बढाने के लिए वेदविद्या का ग्रहण करो तथा वृद्धि का हेतु अग्नि व सब का धारण करनेवाला वायु, अग्निमय सूर्य और ईश्वर उन्हें सब दिशाओं में व्याप्त जानकर यज्ञसिद्धि वा विमान आदि यानों की रचना धर्म के साथ करो तथा इनसे इनको सिद्ध करके दुःखों को दूर करके शत्रुओं को जीतो ।।
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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇
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🙏 🕉️🚩आज का संकल्प पाठ 🕉️🚩🙏
(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮
ओ३म् तत्सत् श्री ब्रह्मणो दिवसे द्वितीये प्रहरार्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वते मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे
कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- एकशत सप्तविंशति:( १,९६,०८,५३,१२७ ) सृष्ट्यब्दे】【 द्विसहस्रत्र्यशीतितम: ( २०८३) वैक्रमाब्दे 】 【 द्वियधिकद्विशतम् ( २०२) दयानन्दाब्दे, सिद्धार्थ -संवत्सरे, रवि- उत्तरायणे , ग्रीष्म -ऋतौ, ज्येष्ठ - मासे, कृष्ण - पक्षे , प्रतिपदायां
तिथौ,विशाखा नक्षत्रे, शनिवासरे
, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर भगते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे
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