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क्रांतिकारियों के प्रेरणा स्त्रोत - महर्षि दयानंद सरस्वती - आर्याभिविनय का प्रभाव

  • Mar 21
  • 3 min read

पुस्तक - बागी दयानंद

लेखक - स्वामी विद्यानन्द सरस्वती


आर्याभिविनय के दूसरे अध्याय (प्रकाश) के पहले मन्त्र में ऋषि दयानन्द ने लिखा है-


"हे मेरे प्रभो! आपकी कृपा से हम सब लोग एकता प्रियमान, रक्षक, सहायक, परम पुरूषार्थी हैं। एक-दूसरे का दुःख न देख मित्रता। स्वदेशस्थाधिकरण को एकरूपता अत्यंत निर्वैर, प्रियतम, पाखंडभक्ति प्रदान करें।"


पुनः ३१वें मन्त्र में ऋषि परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं-


"हे महाराजाधिराज परब्राह्मण! अखंड खंड राज्य के लिए शौर्य, धैर्य, नीति, विनय, अभिनय और बलादि उत्तम गुणयुक्त कृपा से हम लोगों को यथावत पुष्ठ कर। अन्य देशवासी राजा हमारे देश में कभी न हों और हम लोग पराधीन कभी न हों। हे प्रभो! हमें 'दयावापृथिवीभ्यम्' = स्वर्ग अर्थात् परमोत्कृष्ट मोक्षसुख (निःश्रेयस) तथा पृथ्वी अर्थात संसार-सुख (अभ्युदय) इन दोनों के लिए हमारी कृपादृष्टि से हमारी विद्या, पुरुषार्थ, हाथी, घोड़ा, सुवर्ण, हीरादि रत्न, उत्कृष्ट शासन , उत्तम पुरुष और प्रियदियुक्तियुक्त गुण, जिससे हम लोग किसी भी पदार्थ के बिना दुःखी न हो सकें। हे सर्वाधिपते! शूद्रादि भी सेवादि गुण - ये सब स्वदेशभक्त, उत्तम, हमारे राज्य में हैं, यानि किसी भी बात के लिए हम अलोकतांत्रिक पर अभद्र न हों। रात को तैयार हो गए। बाकी अन्य लोग थे- श्यामजीकृष्ण वर्मा।


विश्वविख्यात रूसी लेखक मेक्सिम गोर्की द्वारा भारत के मेज़िनी कहे जानेवाले तथा विदेशों में रहकर ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध सङ्घर्ष का गठन करनेवाले श्यामजीकृष्ण वर्मा का जन्म सन् १८५७ की ऐतिहासिक क्रान्तिवाले वर्ष में ४ अक्टूबर को सौराष्ट्र में कच्छ प्रदेश के माण्डवी नामक क़स्बे में हुआ था। भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन के वे आदि प्रवर्तक थे। भारतीय छात्रों के लिए इङ्गलैण्ड में पढ़ने के लिए सहायता के उद्देश्य से उन्होंने छात्रवृत्तियों की व्यवस्था की। उन्हीं की प्रेरणा और सहायता से वीर सावरकर और लाला हरदयाल जैसे देशभक्त तैयार हुए।


स्वामी दयानन्द की प्रेरणा और सहायता से श्यामजीकृष्ण इङ्गलैण्ड पढ़ने के लिए गये। स्वामीजी ने उनका परिचय ब्रिटिश संस्कृतज्ञ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष मोनियर विलियम्स से कराया। ऑक्सफ़ोर्ड से सन् १८८३ में बी०ए० की डिग्री प्राप्त करनेवाले वे प्रथम भारतीय थे। वहाँ के बेलिओल कॉलेज में पढ़ते समय वे महारानी विक्टोरिया के शासन में इङ्गलैण्ड के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रधानमन्त्री ग्लैड्सटोन के सुपुत्र (लार्ड) ग्लैड्स्टोन के सहपाठी थे। कालान्तर में श्यामजीकृष्ण ने प्रधानमन्त्री ग्लैड्स्टोन से भारत में गोहत्या पर प्रतिबन्ध लगाने की माँग की थी। श्यामजीकृष्ण वर्मा ने राष्ट्रीयता और ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध

सङ्घर्ष का पहला पाठ स्वामी दयानन्द से ही पढ़ा था। १८७५ में जब स्वामीजी ने आर्यसमाज की स्थापना की थी तो उसके सदस्यों की सूची में स्वामी दयानन्द के साथ श्यामजीकृष्ण वर्मा का नाम भी था। स्वामीजी ने श्यामजी को अपनी उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा का सदस्य मनोनीत किया था। आर्याभिविनय से प्रभावित श्यामजी ने १९०५ में रियासत के प्रधानमन्त्री पद से त्यागपत्र दे दिया और सारा जीवन एक आवारा मसीहा के रूप में व्यतीत किया।


क्रान्तिकारियों के गुरु और भारत में ब्रिटिश शासन, विशेषतः पुलीस की दृष्टि में आतङ्क‌वाद के प्रतीक चन्द्रशेखर आज़ाद जब तक आर्याभिविनय के कम-से-कम एक मन्त्र का पाठ नहीं कर लेते थे तब तक रोटी का एक टुकड़ा भी नहीं तोड़ते थे। "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है", तथा "मेरा रंग दे बसन्ती चोला" जैसे गीतों के गायक रामप्रसाद बिस्मिल को कौन नहीं जानता? सामान्यरूप से मनुष्य मृत्यु से भयभीत होते हैं, परन्तु बिस्मिल मृत्युञ्जय थे। फाँसी से चार दिन पहले 'स्थितधी मुनि' के समान जेल की काल कोठरी में लिखी अपनी आत्मकथा में अगले जन्मों में 'कृण्वन्तो विश्वमार्यम्' के आदर्श की पूत्ति का सङ्कल्प प्रकट किया और १९ दिसम्बर १९२७ ईसवी को सोमवार के सबेरे 'विश्वानि देव' के वैदिक मन्त्र के उच्चारण के साथ फाँसी के फन्दे को स्वयं अपने गले में डाल लिया। उनकी अन्तिम इच्छा थी- मालिक तेरी रज़ा रहे और तू ही तू रहे। बाक़ी न मैं रहूँ न मेरी आरज़ू रहे ॥ रामप्रसाद बिस्मिल के ये शब्द ३० अक्टूबर १८८३ को अजमेर में व्यक्त अपने आदर्श ऋषि दयानन्द की भावना 'ईश्वर ! तेरी इच्छा पूर्ण हो' के अनुरूप थे।


सन् १९२०-२१ के असहयोग के आन्दोलन के दिनों में कठोर यातनाएँ सहनेवाले सियालकोट के लाला गणेशदास ने अपने संस्मरणों में लिखा था-


"मैं बड़े गर्व और विश्वास के साथ कहता हूँ कि संसार की कोई भी शक्ति मुझे भयभीत नहीं कर सकती और बड़ी-से-बड़ी विपत्तियों में भी मैं समर्पण नहीं कर सकता, क्योंकि मुझे आर्याभिविनय से अदम्य साहस, आध्यात्मिक शक्ति और मानसिक शान्ति प्राप्त हो चुकी है।"


स्वाधीनता संग्राम में आर्यों के लिए आर्याभिविनय अपूर्व शक्ति व प्रेरणा का स्रोत थी, है और रहेगी।


 
 
 

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