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मानवता का मान: दयानन्द सरस्वती
मानवता का मान: दयानन्द सरस्वती सहदेव समर्पित उदयपुर में एक दिन दो साधु स्वामीजी से मिले। अनेक विषयों पर वार्तालाप के बाद स्वामीजी से बोले कि आप अधिकारी लोगों को ही उपदेश किया करें। जो लोग आपके व्याख्यानों में आते हैं वे सब ही तो अधिकारी नहीं होते! इसका स्वामीजी ने जो उत्तर दिया उसका अभिप्राय यह था कि धर्म के विषय में अधिकार अनधिकार का प्रश्न उठाना सर्वथा व्यर्थ है। धर्माेपदेश सुनने का मनुष्य मात्र को अधिकार है। आपकी जाति और धर्म के सैकड़ों और सहस्रों मनुष्य विधर्मी हो रहे हैं
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Apr 1810 min read


स्वामी दयानंद सरस्वती क्या और कैसे थे...??
महर्षि दयानंद के बारे मे अन्य महानुभबों के विचार .... १ - “स्वराज्य और स्वदेशी का सर्वप्रथम मन्त्र प्रदान करने वाले जाज्वल्यमान नक्षत्र थे दयानंद |” – लोक मान्य तिलक* २- “आधुनिक भारत के आद्द्निर्मता तो दयानंद ही थे | महर्षि दयानन्द सरस्वती उन महापुरूषो मे से थे जिन्होनेँ स्वराज्य की प्रथम घोषणा करते हुए, आधुनिक भारत का निर्माणकिया । हिन्दू समाज का उद्धार करने मेँ आर्यसमाज का बहुत बड़ा हाथ है।- नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ३- “सत्य को अपना ध्येय बनाये और महर्षि दयानंद को अपनाआदर्श
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Apr 85 min read


महाड से दिल्ली तक
20 मार्च आज ही के दिन 1927 में डॉ अम्बेडकर ने महाराष्ट्र के महाड में पानी के टैंक से जाकर अछूत कहे जाने वाले भाइयों को सार्वजनिक रूप से पानी पिलाया था। इसे आजकल के दलित लेखक महाड सत्याग्रह के नाम से महिमा मंडित करते है और दलितों की ब्राह्मणों पर विजय के रूप में प्रदर्शित करते है। ईश्वर ने जल, पृथ्वी, अग्नि आदि पदार्थ से लेकर वेद विद्या, धार्मिक अधिकार सभी के लिए समान रूप से ग्रहण करने के लिए बनाया हैं। मध्यकाल में कुछ अज्ञानियों ने इस व्यवस्था को विकृत कर दिया। इसलिए दोष उन अ
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Mar 225 min read
क्रांतिकारियों के प्रेरणा स्त्रोत - महर्षि दयानंद सरस्वती - आर्याभिविनय का प्रभाव
पुस्तक - बागी दयानंद लेखक - स्वामी विद्यानन्द सरस्वती आर्याभिविनय के दूसरे अध्याय (प्रकाश) के पहले मन्त्र में ऋषि दयानन्द ने लिखा है- "हे मेरे प्रभो! आपकी कृपा से हम सब लोग एकता प्रियमान, रक्षक, सहायक, परम पुरूषार्थी हैं। एक-दूसरे का दुःख न देख मित्रता। स्वदेशस्थाधिकरण को एकरूपता अत्यंत निर्वैर, प्रियतम, पाखंडभक्ति प्रदान करें।" पुनः ३१वें मन्त्र में ऋषि परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं- "हे महाराजाधिराज परब्राह्मण! अखंड खंड राज्य के लिए शौर्य, धैर्य, नीति, विनय, अभिनय और बलादि
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Mar 213 min read


धर्म की आवश्यकता क्यों?
एक दिन गंगा तीर पर एक साधु कमण्डलु आदि प्रक्षालन करके वस्त्र धोने में प्रवृत्त था । दैवयोग से भ्रमण करते हुए ऋषि वहीं जा पहूॅचे । साधुजी ने कहाॅ - आप इतने त्यागी, परमहंस होकर खण्डन मण्डनरूप प्रवृत्ति के जटिल जाल में क्यों उलझ रहे हो ? प्रजा प्रेम का बखेडा क्यों डालते हो ? मनुष्यों के उद्धार से तुम्हे क्या मिलेगा ? आत्मा से प्रेम करो । महर्षि दयानन्द सरस्वती ने कहाॅ - वह प्रेममय आत्मा कहाॅ है ? साधुजी - वह राजा रंकपर्यन्त, हस्ती से लेकर कीट तक सर्वत्र ऊॅच नीच में परिपूर्ण है ।
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Mar 212 min read
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