धर्म और मजहब ( संमप्रदाय ) में अन्तर!!!
- kcptokyomarathon20
- 15 hours ago
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धर्म और मजहब ( संमप्रदाय ) में अन्तर!!!
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१.धर्म का आधार ईश्वर और मजहब का आधार मनुष्य है, धर्म उस ज्ञान का नाम है जिसे मनुष्यों और प्राणिमात्र के कल्याण के लिए परमात्मा ने आदि सृष्टि में प्रदान किया, मजहब वह है जिसे मनुष्यों ने समय समय पर अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए स्वीकार किया और पुन: स्वार्थ सिद्धि के लिए उसका विस्तार किया।।
२.धर्म ईश्वर प्रदत्त है इसलिए एक है इसमें हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, यहूदी, पारसी किसी के लिए भी भेद-भाव नहीं, इसके विपरित मत मतान्तर अनेक मनुष्यों के बनाये होने के कारण अनेक हैं और अपने अनुयायियों के लिये पक्षपात से भरे पडे हैं।
३.धर्म सबका साझा है क्योंकि ईश्वर की देंन है। मजहब अपना अपना है सबका समान नहीं।
४.धर्म सदा से है नित्य है इसलिए उसका नाश नहीं होता, मत मतान्तर नवीन हैं, मनुष्यों द्वारा बनाये हुए हैं, इसलिए उनका नाश अवश्यभावी है।
५.धर्म बुद्धि, तर्क और विज्ञान का उपासक है, धर्म से कोई इन्कार नहीं कर सकता। मजहब या मत बुद्धि, तर्क और विज्ञान का विरोधी है, इसका मानना न मानना इच्छा पर आधारित है, आवश्यक नहीं।
६.धर्म कर्मानुसार फल की प्राप्ति मानता है और पाप और पुण्य क्रेनों का फल अवश्य मिलता है ऐसा मानता है जिस से धरती पर पाप नहीं बढ़ता । मजहब या सम्प्रदाय सिफारिश और शफाइत पर अवलम्बित है। मजहब में जब तक पैग़म्बर या ईसा पुत्र , गुरू या कोई अवतार माना जाने वाला सिफारिश न करे, स्वर्ग का द्वार बन्द रहेगा, और सिफारिश होने पर पापी से पापी भी स्वर्ग में प्रवेश पायेगा।इस धारणा से पाप बढ़ रहे हैं।
७. धर्म ईश्वर से मनुष्यों का सीधा सम्बन्ध बताता है, वह आत्मा और परमात्मा के मध्य मे किसी पीर, पैगम्बर, गुरु, ऋषि, मुनि, अवतार आदि की आवश्यकता नहीं समझता। मजहब या सम्प्रदाय ईश्वर और मनुष्यों के बीच में अपने अपने एजन्टों को ला खडा करता है।
८. धर्म प्राणिमात्र के सुख के लिए है और मत मतान्तर या सम्प्रदाय केवल अपने अनुयायियों के सुख की जिम्मेदारी लेता है क्योंकि मजहब के मानने वाले मोमीन और शेष सब काफिर हैं ऐसा उनका दृष्टिकोण है। मजहब का आधार केवल ईमान (विश्वास) है। मजहब पर ईमान लाओ और सब प्रकार की मौज उडाओ। फिर कोई रोकने वाला नहीं।मज़हब पर विश्वास करो, बस बेडा पार है।
९. धर्म मनुष्य के पूर्ण जीवन का ध्येय बताता है और वर्णाश्रम प्रणाली द्वारा उसको उन्नत बनाता है परन्तु मजहब में ऐसा कोई उदेश्य नहीं वह केवल मनुष्यों को पशु की तरह बंध कर रहना सिखाता है।मज़हब में अकल का दख़ल वर्जित है।
१०. धर्म में सृष्टि के नियम के विरुद्ध कुछ नहीं। मजहब सृष्टि नियमों से विरुद्ध भरे पडे हैं जैसे-एक स्त्री पुरुष से सारी सृष्टि का बनना मानना, मुर्दों का जीवित हो जाना, कुवांरी के पेट से पैदा हो जाना, हनुमान का सूर्य को मुंह में डाल लेना, पत्थर पर मूसा के डण्डा मारने से सात चश्मों का बह निकलना, आदि।
११. धर्म स्त्री पुरुष को समान अधिकार देता है। मजहब स्त्रियों को नरक का द्वार, शैतान की रस्सियां, पापयोनि, दीन, हीन, नीच निर्जीव जिसमें आत्मा नहीं ऐसा बता कर के उनके अधिकारों का संहार करता है।
१२. धर्म में सत्य, सरलता, संतोष, स्नेह , सदाचार और ऊँचा चरित्र आवश्यक हैं, मजहब इन गुणों की उपेक्षा कर वाह्य चिन्हों को महत्व देता है यथा तिलक लगाना, स्लेब लगाना, दाढी केस रखना आदि।
अत: धर्म और मजहब को एक समझना भारी भूल है और यह धर्म-विरोध का बडा कारण है।
मजहब (सम्प्रदाय) मनुष्यता का दुश्मन है।
कहीं आप मजहबी/साम्प्रदायिक तो नहीं आत्म निरीक्षण करें ? मज़हब ने सारे विश्व को बाँट दिया शांति चाहते हो तो मज़हब के स्थान पर धर्म की स्थापना करनी होगी।
#डॉ_विवेक_आर्य


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