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भगतसिंह के प्रेरणास्रोत

भगतसिंह के प्रेरणास्रोत


#डॉ_विवेक_आर्य


इस लेख को पढ़ने वाले ज्यादातर वे पाठक हैं जिन्होंने आजाद भारत में जन्म लिया। यह हमारा सौभाग्य है कि हम जिस देश में जन्मे हैं, उसे आज कोई गुलाम भारत नहीं कहता, उपनिवेश नहीं कहता- बल्कि संसार के एक मजबूत स्वतंत्र राष्ट्र के नाम से हमें जाना जाता है। इस महान भारत देश को आजाद करवाने के लिये हजारों क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति आजादी के पवित्र यज्ञ में डाली। तब कहीं जाकर हम आजाद हुए।

भगतसिंह के बलिदान का महत्त्व

भगतसिंह का नाम भारत की आजादी के आन्दोलन में एक विशेष महत्त्व रखता है। प्रथम तो भगतसिंह उन नौजवानों के लिये प्रेरणास्रोत बने जिन्हें आजादी भीख के रूप में मांगने में कोई रूचि नहीं थी। दूसरे 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन के असफल हो जाने के बाद अंग्रेजी सरकार द्वारा बड़ी निर्दयता से आजादी के दीवानों पर अत्याचार किये गये। उस क्रूरता का उद्देश्य था- भारत की प्रजा के मन में अंग्रेज जाति की श्रेष्ठता और अपराजेय होने के भाव को बल प्रदान करना, जिससे वे दोबारा आज़ादी प्राप्त करने का प्रयास न करें, इस भय को मिटाने में भी भगतसिंह की कुरबानी सदा याद रखी जाएगी।

प्रेरणास्रोत

किसी भी व्यक्ति को महान बनने के लिए महान कर्म यानि तप करना पड़ता है, और उस तप की प्रेरणा उसके संस्कार और विचार होते हैं। किसी भी व्यक्ति के विचार उसे ऊपर उठा भी सकते हैं और उसे नीचे गिरा भी सकते हैं। भगतसिंह के वे संस्कार क्या थे जिनसे उनके व्यक्तित्त्व का निर्माण हुआ। भगतसिंह कई महान आत्माओं से प्रेरित हुए, जैसे- करतार सिंह सराभा, भाई परमानन्द, सरदार अर्जुनसिंह, सरदार किशनसिंह आदि। भगतसिंह के आद्य प्रेरणास्रोत सरदार अर्जुनसिंह उनके दादा थे और स्वामी दयानंद के उपदेश सुनने के बाद वैदिक विचारधारा से प्रभावित हुए थे।

जिनका जीवन बदल गया

सरदार अर्जुनसिंह उन विरल व्यक्तियों में से थे, जिन्हें न केवल स्वामी दयानंद के उपदेश सुनने का साक्षात् अवसर मिला अपितु वे आगे चलकर स्वामीजी की वैचारिक क्रांति के क्रियात्मक रूप से भागीदार भी बने। स्वामी दयानंद के हाथों से उन्हें यज्ञोपवीत प्राप्त हुआ और उन्होंने आजीवन वैदिक आदर्शों का पालन करने का व्रत लिया। उन्होंने तत्काल मांस खाना छोड़ दिया और शराब को भी जीवन भर मुंह नहीं लगाया। अब नित्य हवन उनका साथी और वैदिक संध्या उनके प्रहरी बन गए। समाज में फैले अन्धविश्वास जैसे- मृतक श्राद्ध, पाखंड आदि के खिलाफ उन्होंने न केवल प्रचार किया अपितु अनेक शास्त्रार्थ भी किये।

राष्ट्रीय एकता के पक्षधर

1897 में कुछ सिखों में अलगाववाद की एक लहर चल पड़ी। काहन सिंह नाम से एक सिख लेखक ने ‘हम हिन्दू नहीं’ के नाम से पुस्तक लिखकर सिख पंथ को हिन्दू समाज से अलग दिखाने का प्रयास किया तो सरदार अर्जुन सिंह ने ‘हमारे गुरु वेदों के पैरोकार (अनुयायी) थे’ शीर्षक से पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में उन्होंने गुरु ग्रन्थ साहिब में दिए गए श्लोकों को प्रस्तुत किया जो वेदों की शिक्षाओं से मेल खाते थे और इससे यह सिद्ध किया कि गुरु ग्रन्थ साहिब की शिक्षाएँ वेदों पर आधारित हैं।

सरदार अर्जुनसिंह का धार्मिक दृष्टिकोण

सरदार अर्जुनसिंह ने अपने ग्राम बंगा, जिला लायलपुर में गुरुद्वारे को बनाने में तो सहयोग किया ही, और वे गुरुद्वारा में तो जाते थे पर कभी गुरु ग्रन्थ साहिब के आगे माथा नहीं टेकते थे। वे कहते थे कि गुरु साहिबान की शिक्षा पर चलना ही सही है, वे कहते थे कि मूर्तिपूजा की भांति ही यह पुस्तक पूजा हैं। वे ग्राम के बड़े जमींदार थे, ग्राम के विकास के लिए उन्होंने कुएँ और धर्मशाला भी बनवाई। हर वर्ष अपने ग्राम में आर्यसमाज के प्रचारकों को बुलाकर हवन और उपदेशकों के प्रवचन आदि करवाते थे जिससे ग्राम से छुआछूत, अंधविश्वास और नशे आदि का कलंक सदा के लिए मिट जाये।

सन 1909 में पटियाला रियासत में आर्यसमाज पर राजद्रोह का अभियोग अंग्रेज सरकार ने चलाया। निर्दाेष आर्यसमाज के अधिकारियों और सदस्यों को बिना कारण जेल में बंद कर दिया गया। इसका उद्देश्य सिखों और आर्यों में आपसी वैमनस्य पैदा करना व देसी रियासतों से आर्यसमाज की जागरण-क्रांति की मशाल को मिटा देना था। इस संकट की घड़ी में जब कोई भी वकील आर्यसमाज का केस लड़ने को तैयार न हुआ तो खुद स्वामी श्रद्धानंद ने आर्यसमाज के वकील के रूप में केस की पैरवी की और कोर्ट में सिद्ध किया कि आर्यसमाज का उद्देश्य समाज का कल्याण करना है न कि राजद्रोह करना। इस मामले में सरदार अर्जुनसिंह भी सक्रिय हुए। अन्य आर्यों के साथ मिलकर उन्होंने गुरु ग्रन्थ साहिब के 700 ऐसे श्लोक प्रस्तुत किये जो कि वेदों की शिक्षा से मेल खाते थे। इस प्रकार सिख समाज और आर्यसमाज में आपसी मधुर सम्बन्ध बनाने में आप के प्रयास मील के पत्थर सिद्ध हुए।

सत्य-मार्ग के तपस्वी पथिक

एक बार वे एक विवाह उत्सव में शामिल हुए, जहाँ एक सिख पुरोहित स्वामी दयानंद रचित सत्यार्थप्रकाश की आलोचना कर रहा था। आपने उसे चुनौती दी कि वह जिस कथन के आधार पर आलोचना कर रहा है, वह कथन ही सत्यार्थप्रकाश में नहीं है। उसने कहा कि यदि सत्यार्थप्रकाश लाओगे तो मैं प्रमाण दिखा दूंगा। अर्जुनसिंह जी को उस पूरे गाँव में सत्यार्थप्रकाश न मिला। आप तत्काल अपने गाँव वापस गए और अगले दिन सत्यार्थप्रकाश लेकर वापिस आ गए। आलोचक उन्हें सत्यार्थप्रकाश में वह बात न दिखा सका और माफी मांगकर पिण्ड छुड़ाया। ध्यान दीजिये- अर्जुनसिंह जी का गाँव वहाँ से लगभग 60 मील दूर था। सत्य मार्ग पर चलते हुए जो कष्ट होता है, उसे ही असली तप कहते हैं।

पूरा कुटुंब क्रांति के मार्ग पर

स्वामी दयानंद 1857 के पश्चात् पहले गुरु थे जिन्होंने स्वदेशी राज्य का समर्थन किया और विदेशी शासन का बहिष्कार करने का आह्वान किया। उनके इस जन चेतना के आह्वान का सरदार अर्जुनसिंह पर इतना प्रभाव पड़ा कि न केवल वे स्वयं स्वतंत्रता आन्दोलन में शामिल हुए बल्कि उनका समस्त कुटुंब भी इसी रास्ते पर चल पड़ा था। जब भगतसिंह और जगतसिंह आठ वर्ष के हुए तो अर्जुनसिंह जी ने अपने दोनों पोतों का यज्ञोपवीत पंडित लोकनाथ तर्कवाचस्पति (भारत के पहले अन्तरिक्ष यात्री राकेश शर्मा के दादा) के हाथों से करवाया और एक पोते को दायीं और दूसरे को बायीं भुजा में भरकर यह संकल्प लिया- मैं इन दोनों पोतों को राष्ट्र की बलिवेदी के लिए दान करता हूँ। अर्जुनसिंह जी के तीनों लड़के पहले से ही देश के लिए समर्पित थे.। उनके सबसे बड़े पुत्र और भगतसिंह के पिता किशनसिंह सदा हथकड़ियों की चौसर और बेड़ियों की शतरंज से खेलते रहे, उनके मंझले पुत्र अजीत सिंह को तो देश निकाला देकर मांडले भेज दिया गया, बाद में वे विदेश जाकर गदर पार्टी के साथ जुड़कर कार्य करते रहे। छोटे पुत्र स्वर्णसिंह का जेल में तपेदिक से युवावस्था में ही देहांत हो गया था। अपने दादा द्वारा देशहित में लिए गए संकल्प को पूरा करने के लिए, अपने पिता और चाचा द्वारा अपनाये गए कंटक भरे मार्ग पर चलते हुए भगत सिंह भी वीरों की भांति देश के लिए 23 मार्च 1931 को 23 वर्ष की अल्पायु में फाँसी पर चढ़ कर अमर हो गए। भगतसिंह के मन में उनके दादा सरदार अर्जुनसिंह जी द्वारा बोए गए क्रांति बीज आर्य क्रांतिकारियों भाई परमानन्द, करतार सिंह सराभा, सूफी अम्बा प्रसाद और लाला लाजपत राय जैसे क्रांतिकारियों द्वारा दी गयी खाद से पल्लवित होकर जवान होते-होते देश को आजाद करवाने की विशाल बरगद रुपी प्रतिज्ञा बन गए। यह पूरा परिवार आर्यसमाज की प्रगतिशील विचारधारा से प्रभावित था जिसका श्रेय सरदार अर्जुनसिंह को जाता है।

साम्यवादी लेखों द्वारा अन्याय

‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ भगतसिंह की ये छोटी सी पुस्तक साम्यवादी लाबी द्वारा आज के नौजवानों में खासी प्रचारित की जाती है, जिसका उद्देश्य भगतसिंह जैसे महान बनाना नहीं अपितु नास्तिकता को बढावा देना हैं। इसे कन्धा भगतसिंह का और निशाना कोई और भी कह सकते हैं। मेरा प्रश्न है कि क्या भगतसिंह इसलिए महान थे कि वे नास्तिक थे? अथवा इसलिए कि वे देशभक्त थे? सभी कहेंगे- इसलिए कि वे देशभक्त थे। फिर यह नास्तिकता का प्रोपगंडा अनजान नौजवानों को सत्य से अनभिज्ञ रखने का प्रयास नहीं तो और क्या है! यदि किसी क्रांतिकारी की आध्यात्मिक विचारधारा हमारे लिए आदर्श है तो भगतसिंह के अग्रज पं0 रामप्रसाद बिस्मिल, जो न केवल कट्टर आर्यसमाजी थे, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले थे, जिनका जीवन सत्यार्थप्रकाश को पढ़ने से परिवर्तित हुआ था, क्यों हमारे लिए आदर्श और अनुकरणीय नहीं हो सकते? आर्यसमाज मेरी माता के समान है और वैदिक धर्म मेरे लिए पिता तुल्य है ऐसा उद्घोष करने वाले लाला लाजपतराय क्यों हमारे लिए वरणीय नहीं हो सकते?

मेरा यह प्रश्न उठाने का मंतव्य वीर भगतसिंह के बलिदान को कम आंकने का नहीं हैं, बल्कि यह कहने का है कि हर क्रांतिकारी हमारे लिए महान है, उनकी वीरता और देशसेवा हमारे लिए वरणीय है। भगतसिंह कि क्रांतिकारी विचारधारा और देशभक्ति का कारण नास्तिकता नहीं अपितु उनके पूर्वजों द्वारा माँ के दूध में पिलाई गई देशभक्ति कि लोरियां हैं, जिनका श्रेय स्वामी दयानंद को जाता है।


 
 
 

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