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महाड से दिल्ली तक



20 मार्च

आज ही के दिन 1927 में डॉ अम्बेडकर ने महाराष्ट्र के महाड में पानी के टैंक से जाकर अछूत कहे जाने वाले भाइयों को सार्वजनिक रूप से पानी पिलाया था। इसे आजकल के दलित लेखक महाड सत्याग्रह के नाम से महिमा मंडित करते है और दलितों की ब्राह्मणों पर विजय के रूप में प्रदर्शित करते है। ईश्वर ने जल, पृथ्वी, अग्नि आदि पदार्थ से लेकर वेद विद्या, धार्मिक अधिकार सभी के लिए समान रूप से ग्रहण करने के लिए बनाया हैं। मध्यकाल में कुछ अज्ञानियों ने इस व्यवस्था को विकृत कर दिया। इसलिए दोष उन अज्ञानियों का बनता हैं। जबकि दलित लेखक ब्राह्मण वाद के नाम से दलितों को भड़काते है ताकि उनके तुच्छ लाभ और राजनीतिक स्वार्थों को पूर्ण हो सके।

बहुत कम लोगों को यह बताया जाता है कि महाड सत्याग्रह (कोलाबा जिला बहिष्कृत परिषद 19-20 मार्च 1927) में कार्यक्रम के अंत में डॉ. अंबेडकर की अगवानी में एक विशाल रैली निकालकर चवदार तालाब में प्रवेश करके पानी पीने का प्रस्ताव रखने वाले अनंतराव विनायक चित्रे (1894-1959) भी कायस्थ ब्राह्मण थे। जिन्होंने बाद में डॉ. अंबेडकर को सामयिक जनता साप्ताहिक में एडिटर के रूप में वर्षों तक सेवा दी थी। सन् 1928 में इन्दौर में दलित छात्रावास भी चलाते थे। महाड़ सत्याग्रह केस (20 मार्च 1927) दीवानी केस 405/1927 में शंकराचार्य डॉ. कृर्तकोटि डॉ. अंबेडकर के पक्ष में साक्षी रहे थे । उनकी साक्षी लेने वाले कोर्ट कमिशन भाई साहब महेता भी ब्राह्मण थे । डॉ. अंबेडकर के पक्ष में वह फैसला आया था। और 405-1927 केस का फैसला देने वाले न्यायमूर्ति वि. वि. पण्डित भी ब्राह्मण ही थे। दस साल बाद 17. 3. 1937 के दिन हाइकोर्ट ने डॉ. अंबेडकर के पक्ष में फैसला सुनाया था। दिल्ली अलीपुर के अम्बेडकर संग्रहालय में महाड सत्याग्रह में डॉ अम्बेडकर की सहायता करने वाले सवर्ण समाज के सदस्यों के चित्र और परिचय दिए गये हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि निष्पक्ष लोग अत्याचार के विरुद्ध थे। उनके योगदान को जातिवाद की संकीर्णता ने भुला दिया है।

डॉ अंबेडकर से कई दशक पहले आर्यसमाज ने इस दिशा में बहुत कार्य किया। स्वामी दयानन्द के जीवन में अनेक प्रसंग मिलते है जब उन्होंने अछूत के हाथ से पानी और रोटी खाई। लोगों ने आपत्ति कि तो उन्होंने कहा कि रोटी तो भगवान की देन है और किसी शूद्र का हाथ लगने से अशुद्ध कैसे हो गई? उस काल में एक ब्राह्मण कुल उत्पन्न सन्यासी के लिए ऐसा दृढ़ सामाजिक सन्देश देना अपने आप में एक क्रान्तिकारी कदम था। शूद्रों को धार्मिक अधिकार जैसे वेद पढ़ना, यज्ञ करना, गायत्री जाप करना आदि का धर्मशास्त्रों से प्रामाणिक विधान करना स्वामी दयानन्द की सबसे बड़ी देन था।

स्वामी जी के पश्चात आर्यों ने अनेक ऐसे महान कार्य किये जिससे अछूतों पर अत्याचार बंद हो। कुछ का यहाँ वर्णन है-

दिल्ली के अछूतों ने की मांग थी कि उन्हें सार्वजनिक कुओं से पानी भरने दिया जाये। उन्हें यमुना का गदेला पानी पीना पड़ता था। स्वामी श्रद्धानन्द से यह अत्याचार देखा नहीं गया। उन्होंने यह घोषणा कर दी कि वो सार्वजनिक जुलूस निकालेंगे और इस जुलूस के माध्यम से दलितों को सार्वजनिक कुओं से पानी भरने का अधिकार दिलाएंगे। अछूतों को उनका अधिकार मिलते देख दिल्ली के मुसलमानों ने यह घोषणा कर दी कि वो दलितों को पानी नहीं भरने देंगे। क्योंकि वे सूअरों का मांस खाते है और इस्लाम में सूअर हराम है। स्वामी जी ने प्रति उत्तर दिया कि मांस तो मुसलमान भी खाते हैं। क्या वे उन पर भी पाबन्दी लगाएंगे? आर्यसमाज के प्रभाव से दलितों ने मांसाहार त्याग दिया है और उन्हें आर्यसमाज के प्रचारक शिक्षित एवं संस्कारित भी कर रहे है। तय दिन स्वामी जी के नेतृत्व में जुलूस निकाला गया। यह आंदोलन डॉ अंबेडकर के महाड़ आंदोलन से 3 वर्ष पूर्व 13 फरवरी 1924 को दिल्ली में हुआ था। आज जो जय भीम -जय मीम का नारा लगाते है। उनके पूर्वज मुसलमानों ने देखा कि अछूतोद्धार हो गया तो उनके हाथ से शिकार निकल जायेगा। इसलिए उन्होंने जुलूस पर पथरबाजी आरम्भ कर की। पुलिस ने आकर बीच बचाव किया। स्वामी जी ने सार्वजनिक कुएँ से सभी को पानी पिलाया। इस प्रकार से इस अत्याचार का अंत हुआ। ध्यान दीजिये कि स्वामी श्रद्धानन्द ने डॉ अम्बेडकर से करीब एक दशक पहले सार्वजनिक कुओं से पानी पिलाने का कार्य देश की राजधानी दिल्ली में किया था। स्वामी जी सवर्ण थे जबकि डॉ अम्बेडकर महार समाज से थे। आज कोई दलित लेखक स्वामी जी को इस योगदान के लिए स्मरण तक नहीं करता।

महात्मा नारायण स्वामी उन दिनों वृन्दावन गुरुकुल में प्रवास करते थे। गुरुकुल की भूमि में गुरुकुल का स्वत्व में एक कुआँ था। उस काल में एक ऐसी प्रथा थी कुओं से मुसलमान भिश्ती तो पानी भर सकते थे। मगर चमार कहे जाने वाले अछूतों को पानी भरने की मनाही थी। मुसलमान भिश्ती चाहते तो पानी चमारों को दे सकते थे। कुल मिलाकर चमारों को पानी मुसलमान भिश्तीयों की कृपा से मिलता था। जब नारायण स्वामी जी ने यह अत्याचार देखा तो उन्होंने चमारों को स्वयं से पानी भरने के लिए प्रेरित किया। चमारों ने स्वयं से पानी भरना आरम्भ किया तो उससे कोलाहल मच गया। मुसलमान आकर स्वामी जी से बोले की कुआँ नापाक हो गया हैं क्योंकि जिस प्रकार बहुत से हिन्दू हम को कुएँ से पानी नहीं भरने देते उसी प्रकार हम भी इन अछूतों को कुएँ पर चढ़ने नहीं देंगे। स्वामी जी ने शांति से उत्तर दिया "कुआँ हमारा हैं। हम किसी से घृणा नहीं करते। हमारे लिए तुम सब एक हो। हम किसी मुसलमान को अपने कुएँ से नहीं रोकते। तुम हमारे सभी कुओं से पानी भर सकते हो। जैसे हम तुमसे घृणा नहीं करते, हम चाहते है कि तुम भी चमारों से घृणा न करो।" इस प्रकार से एक अनुचित प्रथा का अंत हो गया। आर्यसमाज के इतिहास में अनेक मूल्यवान घटनाएँ हमें सदा प्रेरणा देती रहेगी।

भागपुर गांव, तहसील बेरी, जिला झज्जर, हरियाणा प्रान्त के निवासी चौधरी शीश राम आर्य गांव के बड़े जाट जमींदार थे। आपने अपने खेत में स्थित कुएँ को दलितों के लिए पानी भरने हेतु खोल दिया। आपके इस महान कर्म की प्रशंसा करने के स्थान पर आपका पुरजोर विरोध आप ही की बिरादरी ने किया। आपको दो वर्ष के लिए बिरादरी से निष्कासित कर दिया गया। आपके सुपुत्र शेर सिंह उस समय आठवीं कक्षा में थे तो उस समय की प्रचलित प्रथा के अनुसार आपका विवाह जाट गोत्र की कन्या से तय हो गया था। जब शेर सिंह के ससुराल पक्ष को मालूम चला कि अपने अपने कुओं पर दलितों को चढ़ा दिया है। तो उन्होंने आपत्ति कर दी। चौधरी शीशराम पर रिश्ता तोड़ने का दवाब तक बनाया गया। शीशराम जी ने कहा मुझे रिश्ता तोड़ना स्वीकार है, मगर दलितों के साथ हो रहे अन्याय का समर्थन करना स्वीकार नहीं हैं। अंत में शेर सिंह का रिश्ता टूट गया। मगर स्वामी दयानंद के सैनिक जातिवाद को मिटाने में कामयाब हुए। बाद में जनसामान्य ने उनकी चेष्टा को समझा और दलितों को सार्वजनिक कुओं से पानी भरने का किसी ने कोई विरोध नहीं किया। प्रोफेसर शेर सिंह जी ने आगे चलकर अंतर्जातीय विवाह किया एवं जाने माने राजनीतिज्ञ एवं भारत सरकार के केंद्र में मंत्री भी बने।

स्वामी श्रद्धानन्द के अछूतोद्धार के अभियान से प्रेरित होकर दो नवयुवकों ने अपने ग्राम के भंगी समाज के युवक को ग्राम के कुँए पर चढ़ा दिया। जैसे ही ग्राम के लोगों को ज्ञात हुआ। उन्होंने कुआँ घेर लिया। वो युवक तो भाग गया पर दोनों नवयुवकों को भीड़ ने पकड़ लिया। दोनों को मार पिट के बाद कान पकड़वा कर दंड बैठक लगवाई गई और जुर्माना किया गया। स्वामी श्रद्धानन्द को जब यह ज्ञात हुआ तो वे उस ग्राम में गये और दोनों युवकों को सम्मानित किया।

आर्यसमाज ने सहभोज, अंतर्जातीय विवाह, गुरुकुल और विद्यालयों में शिक्षा आदि का जातिवाद उन्मूलन के लिए अभियान चलाया। आज के दिन केवल डॉ अम्बेडकर को ही स्मरण न कीजिये। सभी समाज सुधारकों को स्मरण कीजिये।

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