लेख आर्यमित्र १२ फ़रवरी
- kcptokyomarathon20
- Apr 26
- 5 min read
लेख आर्यमित्र १२ फ़रवरी
सौ करोड़ से इकला भारी
महर्षि दयानन्द के समय भारतवर्ष का जितना क्षेत्रफल था, उसमें भारतीय संस्कृति के अनुयायियों की वर्त्तमान संख्या सौ करोड़ से अधिक है। किन्तु हम सब लोग मिलकर भी मानव कल्याण के इतने प्रयास नहीं कर पा रहे हैं, जितने महर्षि दयानन्द ने अकेले कर लिये थे। इस दृष्टि से महर्षि दयानन्द अकेले ही सौ करोड़ मनुष्यों से अधिक भारी हैं।
गुरु विरजानन्द दण्डी ने अपने शिष्य दयानन्द को मुख्य रूप से व्याकरण पढ़ायी थी, अर्थात् अष्टाध्यायी एवं महाभाष्य। अष्टाध्यायी-पद्धति से व्याकरण पढ़ाने में वेदशास्त्र के अनेक मौलिक अंश आ जाते हैं। वस्तुतः अष्टाध्यायी विद्या की कुञ्जी है। विरजानन्द ने दयानन्द को यह कुञ्जी प्रदान की, जिससे दयानन्द ने विद्या रूपी सागर में स्वयं तो गोता लगाया ही, अन्य लाखों-करोड़ों मनुष्यों को भी ज्ञानरूपी मोती-माणिक उपलब्ध कराये।
सत्यार्थ-प्रकाश के ‘पठन-पाठन विधि’ प्रकरण में वे लिखते हैं कि जैसा बड़ा परिश्रम व्याकरण में होता है, वैसा श्रम अन्य शास्त्रों में नहीं करना पड़ता; और जितना बोध इसके पढ़ने से तीन वर्षों में होता है, उतना बोध कुग्रन्थ पढ़ने से पचास वर्षों में भी नहीं हो सकता। परन्तु महर्षि के स्पष्ट निर्देश के बावजूद हम अष्टाध्यायी की उपेक्षा कर रहे हैं। इसका दुष्परिणाम यह हो रहा है कि वैदिक संस्कृति के अनुयायी इतनी विशाल संख्या में होते हुए भी विश्व को वेद के निर्भ्रान्त विद्वान् पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं। तथापि जो इने-गिने व्यक्ति इस मार्ग पर चल रहे हैं, वे धन्य हैं। वे एकजुट होकर समाज का परिष्कार करें ताकि आर्ष पठन-पाठन विधि पुनः प्रतिष्ठित हो जाए।
शिक्षा के लिए महर्षि दयानन्द ने लड़कों एवं लड़कियों को पृथक्-पृथक् पाठशालाओं में पढ़ाने का परामर्श दिया है। इस परामर्श को पुराना बताकर और स्वयं को आधुनिक मानकर हम सह-शिक्षा के पक्षधर बनते हैं। ऐसे में तीन प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठते हैं—(१) क्या विद्यालय में साथ-साथ पढ़ने वाले लड़के-लड़कियाँ एक-दूसरे को भाई-बहिन समझते हैं? (२) वे एक-
दूसरे को जिस दृष्टि से देखते हैं, क्या वह दृष्टि आयुर्विद्यायशोबलम् के लिए हितकर है? (३) क्या बालक-बालिकाओं के माता-पिता इन तथ्यों को नहीं जानते हैं? फिर सह-शिक्षा को अच्छा क्यों कहा जाता है?
सह-शिक्षा के पक्ष में दो प्रबल तर्क दिये जाते हैं—(१) साथ-साथ रहने से बालक-बालिका मन में सन्तुष्ट रहते और परिपक्व बनते हैं। (२) पृथक्-पृथक् विद्यालय खोलने पर व्यय अधिक आता है। वस्तुतः सन्तुष्ट एवं परिपक्व बनने के नाम पर दोनों धीरे-धीरे सम्बन्ध बढ़ाते रहते हैं और अनेक सम्बन्ध किसी के धन, मान या प्राण का हरण कर लेते हैं। जहाँ तक व्यय की बात है, दोनों को मिलाकर जितने व्यय में दस विद्यालय खुलते हैं, उतने धन से पृथक्-पृथक् पाँच-पाँच विद्यालय खुल सकते हैं, और वे दूषण-रहित होंगे।
हमारे ऋषि-मुनियों ने समझ लिया था कि—
घृतकुम्भसमा नारी
तप्तांगारसमः पुमान्।
तस्माद् घृतञ्च वह्निञ्च
नैकत्र स्थापयेद् बुधः॥
—(हितोपदेशे मित्रलाभः)
[स्त्री घी से भरे बर्तन के समान और पुरुष प्रज्वलित अग्नि के समान है; अतः बुद्धिमान् जन इन्हें एकत्र न रखें।] किन्तु हम आधुनिक दिखने के मिथ्या लोभ में इस सत्य को ढके रखने का यत्न कर रहे हैं, और सब मिलकर भी वह सत्य बोलने का साहस नहीं कर पा रहे हैं जो महर्षि ने सहज रूप से अकेले ही बोल दिया था।
महात्मा गांधी ने ईश्वर के लिए ‘हरि’ शब्द का प्रयोग करते हुए चतुर्थ वर्ण को शूद्र के स्थान पर ‘हरिजन’ नाम दिया। गांधीजी वेद के विद्वान् न थे; किन्तु अपनी विद्या एवं सेवा के अनुसार उन्होंने श्रेष्ठ कार्य करने का प्रयास किया। फिर भी, चतुर्थ वर्ण रहा तो पृथक् ही। उनसे कुछ समय पूर्व वेदों के विद्वान् महर्षि दयानन्द ने वेदमन्त्र के अनुसार चतुर्थ वर्ण के समानाधिकार का प्रस्थापन किया—
यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय॥
—(यजुर्वेद : अ०-२६, मं०-२)
[परमेश्वर कहता है कि हे मनुष्यों! जैसे मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री, सेवक और अन्त्यज, इन सब
मनुष्यों के लिए चारों वेदरूप वाणी
का उपदेश करता हूँ, वैसे आप लोग भी उपदेश करें।] सत्यार्थ-प्रकाश में महर्षि कहते हैं कि जैसे परमात्मा ने पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, चन्द्र, सूर्य और अन्नादि पदार्थ सबके लिए बनाये हैं, वैसे ही वेद भी सबके लिए प्रकाशित किये हैं। जो परमेश्वर का अभिप्राय शूद्रादि के पढ़ाने-सुनाने का न होता, तो इनके शरीर में वाक् और श्रोत्र इन्द्रिय क्यों रचता?
महर्षि दयानन्द ने वैदिक संस्कृति के अनुसार वर्ण-व्यवस्था को कर्म-आधारित घोषित किया। कर्म-आधारित व्यवस्था में वयस्क मनुष्य का वर्ण उसके पूर्वजों से सम्बद्ध नहीं रहता। प्रत्येक मनुष्य अपना वर्ण स्वयं चुनता है। इस प्रकार स्थायी भेद रहता ही नहीं है। आज हम सवर्ण-अवर्ण एकता का जितना प्रयास करते हैं, इनके मध्य की खाई उतनी ही चौड़ी एवं गहरी होती जा रही है। इसका कारण यह है कि हमारे प्रयास में सवर्ण सदा सवर्ण और अवर्ण सदा अवर्ण रहता है। जब भेद बना रहता है तो वह अनुभव क्यों न होगा? यह भेदभाव मिटे, इसका एक ही समाधान है—कर्माधारित वर्णव्यवस्था। इसके लिए आवश्यक है कि यदि हम सौ करोड़ व्यक्ति मिलकर महर्षि दयानन्द के समान साहस नहीं जुटा सकते, तो उनकी घोषणा के डेढ़ सौ वर्ष बाद अपने अनुकूल लोगों के बीच तो यह बात दोहराने का साहस कर ही लिया करें।
सत्यार्थ-प्रकाश के अन्तिम चार समुल्लासों में महर्षि दयानन्द ने विश्व के समस्त सम्प्रदायों की समीक्षा की है। इससे तिलमिलाकर कुछ मतवाले लोग यह कहते फिरते हैं कि दयानन्द के समान कड़वाहट किसी धर्माचार्य ने नहीं उगली। यह कहना भयंकर भूल है और पाप भी है। वस्तुतः बुद्ध-कबीर-नानक-लूथर ने सम्प्रदायों के दोष गिनाये; किन्तु यह नहीं बताया कि धर्म का वास्तविक स्वरूप क्या है और असत्य को छोड़कर सत्य का ग्रहण कैसे किया जा सकता है? उनके नामों पर नये सम्प्रदाय बन गये और उनके लिए लड़ने वाले नये समूह खड़े हो गये। यह निश्चयपूर्वक भयंकर भूल है। यह पाप इसलिए है कि इन सज्जन आचार्यों ने समाज को वेदमार्ग पर चलाने के बजाए वेदविरुद्ध मार्गों पर चलाया। इसी कारण महर्षि दयानन्द ने इनकी आलोचना की है; किसी सही बात
को ग़लत बताने के लिए नहीं।
वेदमार्ग और वेदविरोध का रहस्य दयानन्द ने समझाया और समस्त सम्प्रदायों के बुद्धिमान् मनुष्यों ने इसे समझा तथा मन में सराहा भी। यद्यपि द्वेषकर्त्ता मतान्ध लोग महर्षि के प्राण-हरण के प्रयत्न करते रहे; किन्तु विश्व-समाज को दयानन्द की समीक्षाओं से अत्यन्त लाभ हुआ। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि अनेक धर्माचार्यों के व्याख्यानों के समय समाज में जातीय एवं साम्प्रदायिक दंगे भड़कते रहे; किन्तु महर्षि दयानन्द की समालोचनाओं के समय ऐसे दंगे कभी नहीं हुए। प्रत्युत लोग अपने तथा अन्य सम्प्रदायों के गुण-दोष जानने में लगे रहे और शत्रुता में कमी आयी। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि वस्तुनिष्ठ समालोचनाएँ, जो द्वेष एवं पक्षपात से मुक्त हों, धार्मिक ज्ञान के लिए तो आवश्यक हैं ही, सामुदायिक सौमनस्य के लिए भी आवश्यक हैं।
आज विश्व में अनेक देश हैं जहाँ एक व्यक्ति का शासन है। यह भारत का आदर्श नहीं हो सकता। भारत में लोकतन्त्र का होना तो उत्तम है; किन्तु वेदविरोधी, राष्ट्रविरोधी और सदाचार-विरोधी लोगों के कोलाहल को जितना महत्त्व मिल जाता है, वह आदर्श स्थिति की प्राप्ति में बाधक है। प्रतिक्षण कहीं-न-कहीं अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। महिलाएँ, बच्चे, भोलेजन और सात्त्विक व्यवस्था प्रतिदिन सैकड़ों बार दारुण कष्ट झेलने को विवश हैं। अतः राजनेता, न्यायाधीश, पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों में सभी का स्वच्छ-सुयोग्य होना आवश्यक है।
मनुस्मृति (७-५४) के अनुसार—
मौलान् शास्त्रविदः
शूराँल्लब्धलक्षान् कुलोद्गतान्।
सचिवान् सप्त चाष्टौ वा
प्रकुर्वीत परीक्षितान्॥
[स्वराज्य स्वदेश में उत्पन्न हुए, वेदादिशास्त्रों के जाननेवाले, शूरवीर, जिनका विचार निष्फल न हो, कुलीन और अच्छे प्रकार सुपरीक्षित सात या आठ उत्तम धार्मिक चतुर मन्त्री हों।] मन्त्रियों की संख्या तो राष्ट्रीय व्यवस्था के अधीन है। परन्तु योग्यता एवं चरित्र में कोई ढील या अशुद्धता कदापि नहीं होनी चाहिए।
साधारण मनुष्यों का आत्मा सत्य को जानता हुआ भी स्वार्थ, पक्षपात एवं भय के कारण उसका पूर्ण पालन नहीं कर पाता। ऋषिजन
सर्वदा सत्य ही मानते, बोलते एवं करते हैं। महर्षि दयानन्द भी अन्य ऋषियों की भाँति सदैव सत्य के पक्षधर हैं। हम वैदिक संस्कृति के अनुयायियों का आवश्यक कर्त्तव्य है कि हम ऋषियों के बताये मार्ग पर चलते रहें। क्या हम करोड़ों व्यक्ति मिलकर विद्या, सदाचार, राष्ट्रोत्थान एवं पारस्परिक सौमनस्य के इतने प्रयत्न कर सकते हैं, जितने महर्षि दयानन्द ने अकेले कर लिये थे? हम महर्षि के शिष्य-प्रशिष्य हैं और यह निश्चय ही हमारा आवश्यक कर्त्तव्य है। आइए, भारत के निर्माण-कार्य को आगे बढ़ाएँ।
(डॉ० रूपचन्द्र ‘दीपक’)
प्राचार्य,
वैदिक उपदेशक विद्यालय,
बी-७२, आर्य समाज शृंगारनगर,
लखनऊ-२२६००५
दिनांक : ९ फ़रवरी, २०२६


Comments