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🚩‼️ओ३म्‼️🚩 | 🕉️🙏नमस्ते जी | दिनांक - २२ अप्रैल २०२६ ईस्वी | दिन - - बुधवार

Apr 22
5 min read


🌒 तिथि षष्ठी ( २२:४९ तक तत्पश्चात सप्तमी )


🪐 नक्षत्र - आर्द्रा ( २२:१३ तक तत्पश्चात पुनर्वसु )


पक्ष - - शुक्ल

मास - - वैशाख

ऋतु - - बसंत

सूर्य - - उत्तरायण )


🌞 सूर्योदय - - प्रातः ५:४९ पर दिल्ली में

🌞 सूर्यास्त - - सायं १८:५१ पर

🌒 चन्द्रोदय -- ९:५९ पर

🌒 चन्द्रास्त - - ‌‌२४:२५ पर


सृष्टि संवत् - - १,९६,०८,५३,१२७

कलयुगाब्द - - ५१२७

विक्रम संवत् - -२०८३

शक संवत् - - १९४८

दयानंदाब्द - २०२


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🕉️‼️ओ३म्‼️🚩


🔥वैदिक रीति से दाह-संस्कार करें ।

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मानव शरीर जीवन का आरम्भ गर्भाधान_संस्कार से होता है | सनातन वैदिक धर्म में गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि संस्कार तक सोलह संस्कार हैं... गर्भाधान संस्कार जो एक नितांत ही निजी गोपनीय संस्कार होता है...लेकिन शरीर का अंत अंत्येष्टि संस्कार से होता है जिसे हम अंतिम क्रिया कर्म कहते हैं,इस कार्य में कोई गोपनीयता नहीं बरती जाती यह एक सार्वजनिक संस्कार होता है इसके पीछे का रहस्य यही है कि काम क्रोध वासना में डूबे व्यक्ति मानक देह की नश्वरता का आत्मा अनुभूत प्रत्यक्ष कर सकें | इसी को नरमेध_यज्ञ कहा जाता है| अंतिम संस्कार को यज्ञ माना गया है तो अंतिम संस्कार में शामिल मनुष्य को इसका पुण्य भी मिलना चाहिए लेकिन वह तब ही मिलेगा जब हम वैदिक रीति से मृत शरीर का दाह संस्कार करेंगे लेकिन आज हम देखते हैं बहुसंख्यक हिंदुओं में वैदिक_रीति से दाह संस्कार नहीं होता| शव को जल्दी-जल्दी में ठिकाने लगा दिया जाता है शव को जलाना ही संस्कार मान लिया है बहुत कम घी , सामग्री उपयोग किया जाता है जिससे मृतक शरीर के अवशेष कीटाणु वातावरण में फैल जाते है पूर्णतया नष्ट नहीं हो पाते पर्यावरण का प्रदूषण होता है पुण्य के स्थान पर हम जाने अनजाने में पाप के भागी बन रहते हैं।


आलस्य ,अज्ञान के कारण आज हम सनातन वैदिक पद्धति से मानव शव का दाह संस्कार नहीं कर रहे हैं जिस पद्धति से हमारे पूर्वज करते थे | हमारे ऐतिहासिक ग्रंथ रामायण महाभारत में भी विधिवत अंत्येष्टि कर्म का ही वर्णन मिलता है |आइए हम आपको वैदिक अंत्येष्टि कर्म पद्धति से अवगत कराते हैं सबसे प्रथम श्मशान भूमि में को खोदकर #वेदी निर्मित की जाती थी | इसका औसत आकार आयताकार ७×४ होता था| मृतक के शरीर की मोटाई से उसकी गहराई निर्धारित की जाती थी सर की तरफ ऊंची पैरों की तरफ ढलान लिए बनाई जाती थी| इसके पश्चात गाय के गोबर से उसे लीप दिया जाता था| लेकिन आज हम देखते हैं जमीन पर ऊपर रखकर ही दाह संस्कार कराया जा रहा है जो वैज्ञानिक तौर पर उचित नहीं है आवश्यक अधिकतम ११०० डिग्री सेल्सियस तापमान उत्पन्न नहीं हो पाता है | दहन_दक्षता Burning_effecinecy कम होने से कार्बन_डाइऑक्साइड ज्यादा उत्सर्जित होती है फलस्वरूप ज्यादा प्रदूषण होता है हमारे पूर्वजों ने इस तथ्य को अरबो वर्ष पहले भाप लिया था इस कारण वह जमीन के अंदर यज वेदी खोदकर दाह संस्कार करते थे| विश्व_स्वास्थ्य_संगठन की जैव अपशिष्ट निपटारे के संबंध में जो गाइड लाइन है उनका पालन सैकड़ों हजारों वर्षों से कर रहे हैं हमारे पूर्वज लेकिन अब हम नहीं कर रहे हैं हम तब ही कर पाएंगे जब वैदिक रीति से दाह संस्कार दोबारा प्रचारित प्रसारित होंगे| हमारे श्मशान गांव की दक्षिण_दिशा में होते थे इसका कारण यह था कि दक्षिण दिशा से मौसमी हवाएं बहुत कम चलती हैं जिससे कम से कम दुर्गंधी गांव की ओर आएगी|


अब हम संस्कार पक्ष पर आपको बतलाते हैं मृतक के शरीर के वजन के बराबर गाय का घी तथा वजन से दुगनी सामग्री इस्तेमाल की जाती थी| चंदन, बड, आम पलास की लकड़ी इस्तेमाल की जाती थी गोबर के उपले कंडे उपला का प्रयोग वर्जित था | चार मनुष्य चिता के चारों ओर खड़े होकर यजुर्वेद के १२१ मंत्रों से आहुति देते थे तब तक यह कार्यक्रम चलता था जब तक मानव-देह भसम होकर पंचतत्व में विलीन नहीं हो जाती थी | आज हम मानव शरीर को भस्म होने से पूर्व भी श्मशान भूमि को छोड़ देते हैं यह उस मृतक के शव का अपमान तिरस्कार है| इस बात के पीछे एक मनोवैज्ञानिक रहस्य है कि मनुष्य जितना अधिक श्मशान में समय गुजारेगा वैराग्य की भावना इतनी प्रबल होगी उसके विकार उतने ही नष्ट होंगे सो यह फलदायक था|


बहुत से बुद्धिजीवी कहेंगे भाई यदि इस रीति से संस्कार करें तो आज के जमाने में ५०००० से लेकर १००००० रुपए तक खर्च आएगा , धनराशि कौन वहन करेगा? हम पूछते हैं मृतक अपने पीछे करोड़ों लाखों की जायदाद छोड़ जाता है अपने जीवन में वह इस धरती को कितना प्रदूषित करता है मलमूत्र के माध्यम से अपनी कार से लाखों रुपए का पेट्रोल फूक देता है |क्या वह अपने जीते जी दाह संस्कार के संबंध में कुछ रुपयों की व्यवस्था नहीं कर सकता?| जिससे उसका यह मानव चोला सम्मान सहित देवों में विलीन हो जाए जिस के सहयोग से उसने अकूत धन संपदा एकत्रित की है| उसके संबंधियों का भी तो कुछ दायित्व बनता है जो उसकी संपत्ति के उत्तराधिकारी बनते हैं| रही बात गरीब व्यक्ति की तो उसके लिए समाज व्यवस्था सहयोग करें मानव दाह संस्कार यज्ञ में शामिल होने वाले घी सामग्री आदि अपने सामर्थ्य अनुसार दे तभी तो पुण्य मिलेगा|


आज हम दुर्भाग्य से वैदिक विधि से दाह संस्कार पर कम धनराशि खर्च कर रहे हैं इसके पश्चात होने वाले गायत्री, मृतक श्राद्ध, मृतक भोज, अस्थि विसर्जन( मां तुल्य जीवनदायिनी नदियों को प्रदूषित करना) जैसी अवैदिक परंपराओं पर ज्यादा धनराशि खर्च कर रहे हैं व पाखंडी लोगों का शिकार हो रहे हैं |यह सब अवैदिक परंपराएं महाभारत काल के पश्चात चली हैं जिनका कोई वैज्ञानिक ,आध्यात्मिक ठोस आधार नहीं है| रामायण महाभारत आदि ऐतिहासिक धर्म ग्रंथों में मृतक दाह संस्कार के पश्चात हवन अग्निहोत्र दाह संस्कार स्थल के पास ही नदियों में स्नान का उल्लेख तो मिलता है लेकिन मृतक की भस्मी हड्डियां आदि को गंगा आदि नदियों में प्रवाहित करने का कोई उल्लेख नही

ऐसा प्रतीत होता है नदियों में अस्थि प्रवाहित करने की अवैदिक परंपरा महाभारत काल से भी लगभग ३००० वर्ष पश्चात आई... अर्थात जैन , बौद्ध धर्म जैसे संप्रदायों के भारतवर्ष में अस्तित्व में आने के पश्चात|


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🕉️🚩आज का वेद मंत्र 🕉️🚩


🌷ओ३म् स्वस्तिरिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्णस्वत्यभि या वाममेति। सा नो अमा सो अरणे नि पातु स्वावेशा भवतु देवगोपा: (ऋग्वेद १०|६३|१६)


💐अर्थ :- जो पृथ्वी उत्तम गुण वाली, उत्तमोत्तम धन - धान्य से युक्त है, अच्छे मार्ग के लिए कल्याणकारी ही होती है, वही पृथ्वी हमारे लिए, हमारे यज्ञ के लिए, हमारे सुन्दर निवास के लिए, घर में वा वन में रक्षा करें तथा परमात्मा द्वारा रक्षित हमारा सदा कल्याण करती रहें।


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🔥विश्व के एकमात्र वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार👇

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🙏 🕉🚩आज का संकल्प पाठ 🕉🚩🙏


(सृष्ट्यादिसंवत्-संवत्सर-अयन-ऋतु-मास-तिथि -नक्षत्र-लग्न-मुहूर्त) 🔮🚨💧🚨 🔮


ओ३म् तत्सत् श्री ब्रह्मणो दिवसे द्वितीये प्रहरार्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वते मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे

कलिप्रथमचरणे 【एकवृन्द-षण्णवतिकोटि-अष्टलक्ष-त्रिपञ्चाशत्सहस्र- एकशत सप्तविंशति:( १,९६,०८,५३,१२७ ) सृष्ट्यब्दे】【 द्विसहस्रत्र्यशीतितम: ( २०८३) वैक्रमाब्दे 】 【 द्वियधिकद्विशतम् ( २०२) दयानन्दाब्दे, सिद्धार्थ -संवत्सरे, रवि- उत्तरायणे , बंसत -ऋतौ, वैशाख - मासे, शुक्ल - पक्षे , षष्ठम्यां

तिथौ, आर्द्रा नक्षत्रे, बुधवासरे

, शिव -मुहूर्ते, भूर्लोके जम्बूद्वीपे, आर्यावर्तान्तर भगते, भारतवर्षे भरतखंडे...प्रदेशे.... जनपदे...नगरे... गोत्रोत्पन्न....श्रीमान .( पितामह)... (पिता)...पुत्रोऽहम् ( स्वयं का नाम)...अद्य प्रातः कालीन वेलायाम् सुख शांति समृद्धि हितार्थ, आत्मकल्याणार्थ,रोग,शोक,निवारणार्थ च यज्ञ कर्मकरणाय भवन्तम् वृणे


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Guest
Apr 22

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