हिन्द की चादर: गुरु तेग बहादुर जी
हिन्द की चादर: गुरु तेग बहादुर जी
(प्रकाश उत्सव पर विशेष रूप से प्रचारित)
#डॉ_विवेक_आर्य
गुरु तेग बहादुर जी को हिन्द के चादर के नाम से जाना चाहता है। संसार को ऐसे बलिदानियों से प्रेरणा मिलती है, जिन्होंने अपने प्राण दे दिए पर सत्य के मार्ग का त्याग नहीं किया। नवम पातशाह श्री गुरु तेग बहादुर जी भी ऐसे ही बलिदानी थे। गुरु जी ने स्वयं के लिए नहीं, बल्कि अन्यों के अधिकारों एवं विश्वासों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। गुरु जी 11 अगस्त 1664 को नवें गुरु के रूप में गद्दी पर बैठे। औरंगज़ेब को यह सहन नहीं हुआ कि कोई गैर मुसलमान जनता का मार्गदर्शन करें। उसे सच्चा पातशाह शब्द से नफरत थी। उसने गुरु जी को गिरफ्तार कर लिया और मिर्जा राजा जय सिंह के आग्रह पर 2 महीने 3 दिन के पश्चात 11 जनवरी 1666 को छोड़ा। आप पंजाब में ठीक हालात न देख देश के पूर्व भाग को चल दिए। आप कुछ समय पटना रुकें और अपने परिवार को छोड़कर वहां से असम निकल गए। पीछे से पटना में गुरु गोविन्द सिंह जी का जन्म हुआ था। असम में आप राजा राम सिंह जी के साथ 2.5 वर्षों तक रहे।
दिल्ली का तख़्त औरंगज़ेब ने अपने पिता शाहजहां को लगभग 10 वर्षों तक कैद में रखकर और अपने सगे भाइयों की हत्या कर प्राप्त किया था। ऐसे विभित्स कृत्यों को कर औरंगज़ेब के मन में आलमगीर बनने की सनक उठी। प्रजापालक के कर्त्तव्य को भूलकर उसने हिन्दुओं पर निर्मम अत्याचार करने आरम्भ कर दिए। इतिहासकार औरंगज़ेब के अत्याचारों के विषय में लिखते हैं कि,
"औरंगज़ेब ने आज्ञा दी है कि हिन्दुओं के मंदिरों को गिराया जाएँ और पुराने मंदिरों की मरम्मत न करने दे। 1661-62 मथुरा के बड़े मंदिर को तोड़कर उसे जामा मस्जिद में बदल दिया था। अप्रैल 1665 से हिन्दुओं पर किसी भी सामान को खरीदने पर दुगुना कर लगा दिया गया। मई 1667 से मुसलमानों के ऊपर से सभी कर हटा दिए गए। 1668 से हिन्दुओं के मेलों और त्योहारों पर रोक लगा दी गई। गरीब हिन्दुओं को तो कर अदा करने के लिए अपने बीवी बच्चों को बेचना तक पड़ता था। मासिर-ए-आलमगीरी में लिखा है कि अप्रैल 1669 में औरंगज़ेब ने अपने सभी प्रदेशों के शासकों को यह हुकूम जारी किया कि वो काफिरों के मंदिरों और पाठशालों को गिरा दे और वहां पर किसी भी प्रकार की मूर्तिपूजा कड़ाई से न होने दे। जनवरी 1670 को औरंगज़ेब ने मथुरा के प्रसिद्द केशवदेव मंदिर को गिरा दिया और मथुरा का नाम बदलकर इस्लामाबाद कर दिया था। इस मंदिर का गुम्बद इतना ऊँचा था कि 54 किलोमीटर दूर आगरा में दीखता था। सय्यद मुहम्मद लतीफ़ के अनुसार इस मंदिर की मूर्तियों को धवस्त कर उसे आगरा की नवाब बेगम मस्जिद की सीढ़ियों में गाड़ दिया गया था। अकेले राजस्थान में 300 मंदिरों और उनकी मूर्तियों को तोड़ दिया गया था। सरहिंद के बुरिया के खिजराबाद परगना के गुरुद्वारा को सरहिंद के क़ाज़ी ने गिराकर मस्जिद में बदल दिया था। " ( वही, पृ. 198-200)
गुरु जी को ये सभी सूचनाएं असम में मिल रही थी। औरंगजेब को दिल्ली के तख्त पर कब्जा किए 2 दशक से अधिक बीतने को थे। औरंगजेब के अत्याचार अपने शिखर पर थे। गुरु जी से रहा नहीं गया और आप जून 1670 को आगरा सपरिवार पहुंचे। आपको औरंगज़ेब ने 2 माह के लिए नजरबंदी में रखा और फिर छोड़ दिया। आप वापिस पंजाब आ गए और आनंदपुर साहिब में रुकें। गुरु जी ने सिखों और हिन्दुओं का सशस्त्रीकरण और संगठन बनाना आरम्भ कर दिया था।
उन्हीं दिनों औरंगज़ेब ने पंजाब में डेरा डाला। अपनी मतान्ध नीति से वो यहाँ भी बाज नहीं आया। सय्यद मुहम्मद लतीफ़ लिखता है, " औरंज़ेब ने उन दिनों कई सौ ब्राह्मणों को जेल में ठूस दिया था। उसे यह आशा थी कि वे भय से इस्लाम स्वीकार कर लेंगे। उनकी देखा देखि बाकि हिन्दू भी इस्लाम स्वीकार कर लेंगे।" यह अत्याचार पंजाब और कश्मीर के हिन्दुओं पर हो रहा था। ( वही, पृ. 202)
1671 में नवाब इफ्तिखार खान को कश्मीर का सूबेदार बनाकर भेजा गया। उसे कश्मीरी पंडितों को इस्लाम में दीक्षित करने के लिए भेजा गया था। ताकि देखा-देखी बाकि हिन्दू इस्लाम स्वीकार कर ले। उसके कृत्यों से कश्मीरी पंडित आतंकित हो गए। डक्कन में शिवाजी लोहा ले थे थे, आगरा मथुरा में जाट और सतनामी विद्रोह को दबाया जा चूका था। 600 वर्षों के इस्लामिक शासन में पंजाब में गुरु हरगोविंद ने सेनाओं को जोड़ना आरम्भ किया था। ऐसे में उनकी दृष्टि उनके पुत्र गुरु तेगबहादुर पर गई। 1675 ई० का समय है। कश्मीरी पंडितों का 15 सदस्यों का एक दल मातन के पं किरपा राम दत्त के नेतृत्व में गुरु तेग बहादुर जी के दरबार में 15 मई 1675 को कीरतपुर साहिब आया। उन्होंने फरियाद की- हे सच्चे पातशाह, कश्मीर का सूबेदार बादशाह औरंगजेब को खुश करने के लिए हम लोगों का धर्म परिवर्तन करा रहा है, आप हमारी रक्षा करें। यह फरियाद सुनकर गुरु जी चिंतित हो उठे। इतने में, मात्र नौ वर्षीय श्री गुरु गोविंद सिंह बाहर से आ गए। अपने पिता को चिंताग्रस्त देखकर उन्होंने कारण पूछा। गुरु पिता ने कश्मीरी पंडितों की व्यथा कह सुनाई। साथ ही यह भी कहा कि इनकी रक्षा सिर्फ तभी हो सकती है, जब कोई महापुरुष अपना बलिदान करे। बालक गोविंद राय जी ने स्वाभाविक रूप से उत्तर दिया कि इस महान बलिदान के लिए आपसे बड़ा महापुरुष कौन हो सकता है? नवम पातशाह ने पंडितों को आश्वासन देकर वापस भेजा कि अगर कोई तुम्हारा धर्म परिवर्तन कराने आए, तो कहना कि पहले गुरु तेग बहादुर का धर्म परिवर्तन करवाओ, फिर हम भी धर्म बदल लेंगे। नवम पातशाह औरंगजेब से टक्कर लेने को तैयार हो गए। बालक गोविंद राय को गुरुगद्दी सौंपी और औरंगजेब से मिलने के लिए तैयार हो गए। (वही, 209-210)
औरंगजेब ने गुरु जी को गिरफ्तार किया और दिल्ली में काल-कोठरी में बंद कर दिया। उनके साथ भाई मति दास, भाई सती दास और भाई दयाला थे। जो झेलम के करियाला ग्राम के मोहियाल ब्राह्मण थे। लतीफ़ लिखता है, " औरंगज़ेब ने गुरूजी को करामात दिखाने अथवा इस्लाम स्वीकार करने का प्रलोभन दिया। गुरु जी ने कि करामात दिखाना ईश्वर की सत्ता में हस्तक्षेप करना है और जहाँ तक इस्लाम की बात है। वो अपने धर्म को महान समझते है। इसलिए उन्हें इस्लाम स्वीकार करने की कोई आवश्यकता नहीं है।" औरंगज़ेब ने क्रोधित होकर अगले पांच दिनों के लिए गुरूजी पर अत्याचार करने का आदेश दे दिया। उसने सोचा था कि भय से गुरु जी इस्लाम स्वीकार कर लेंगे। गुरु जी को लोहे के पिंजरे में बंद कर दिया गया और उन्हें चांदनी चौक में जहाँ आज फव्वारा है। वहां लाया गया। सबसे पहले भाई मति दस को मुसलमान बनने को कहा गया। उन्होंने उत्तर दिया कि उनका धर्म सत्य है और इस्लाम मिथक। अगर ईश्वर इस्लाम को प्रोत्साहित करने वाले होते तो सभी को सुन्नत करके भेजते। मति दास को दो खंबों के मध्य बांध दिया गया और सर से लेकर पैर तक ारे से चिर दिया गया। दयाल दास ने यह अत्याचार देखकर औरंगज़ेब की आलोचना की तो उन्हें लोहे की जंजीर से बांधकर उबलते तेल में जिन्दा जलाकर मार दिया गया। सती दास ने जब इस अत्याचार का विरोध किया तो उनके शरीर के टुकड़े टुकड़े कर दिए गए। गुरु जी के सामने यह सब अत्याचार हो रहा था। वो स्थिरचित अपने बलिदान करने के लिए तैयार थे। उनके मन को कोई भी प्रलोभन छू नहीं पा रहा था। उनका ध्यान, चेतना, सोच, भावना, बुद्धि सब ईश्वर में लीन हो गई। उन्हें पता था कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा। सदा के लिए अमर हो जायेगा। उनके बलिदान से एक नए राष्ट्र का जन्म होगा। जिससे उपजे सिख महारथी इतिहास में एक नया अध्याय लिखेंगे। 11 नवंबर 1675 के दिन उन्हें चांदनी चौक में जहाँ आज शीशगंज गुरुद्वारा हैं। वहां एक चौकी पर बैठाकर उनका शीश काट दिया गया। सैकड़ों की भीड़ इस अत्याचार को देखने के लिए उपस्थित थी। मतान्ध शासक यहाँ तक नहीं रुका। उनके मृत सर और धड़ को हाथी पर लादकर उसका जुलूस निकाला गया और फिर चांदनी चौक में कोतवाली पर रख दिया गया। गुरु जी के एक सिख भाई जैता जी ने गुरु जी के शीश को आनंदपुर साहिब लाने की दिलेरी दिखाई। गुरु गोविंद सिंह जी ने भाई जैता के साहस से प्रसन्न होकर उन्हें रंगरेटे-गुरु के बेटे का खिताब दिया। गुरु जी के शीश का दाह-संस्कार आनंदपुर साहिब में किया गया। गुरु जी के शरीर को भाई लखी शाह और उनके पुत्र अपने गांव रकाबगंज ले गए और घर में आग लगाकर गुरु जी का दाह-संस्कार किया। आज यहां गुरुद्वारा रकाबगंज, दिल्ली सुशोभित है। दिल्ली में आज भी गुरुद्वारा शीशगंज नवम पातशाह श्री गुरु तेग बहादुर जी के धर्म बलिदान का स्मरण कराता है। ( वही, पृ.211-218)
गुरु तेगबहादुर के बलिदान से हिन्दुओं -सिखों में मतान्ध शासक औरंगज़ेब प्रति बेहद क्रोध उत्पन्न हुआ। इस जन चेतना ने गुरु गोविंद राय को गुरु गोविन्द सिंह में परिवर्तित कर दिया। एक असंगठित, जात पात के नाम पर विभाजित कौम को खालसा के झंडे तले एकत्र कर एक न्य अध्याय लिखने की तैयारी हो चली थी। हिन्द चादर महान गुरु तेग बहादुर के धर्म बलिदान को नमन। मोहियाल ब्राह्मण भाई मति दास, सती दास और दयाला दास को नमन।
गुरुद्वारा शीशगंज और रकाबगंज बनने की शौर्य गाथा जाने बिना यह बलिदान गाथा पूरी नहीं होती। इस घटना के 100 वर्ष बाद 1783 में सिख जनरल बघेल सिंह के नेतृत्व में सिखों का दिल्ली पर अधिकार हो गया। उसने तेलीवाड़ा में माता सुंदरी और माता साहिब की स्मृति में प्रथम गुरुद्वारा बनवाया। दूसरा गुरुद्वारा जयपुर के महाराज जय सिंह के बंगले के स्थान पर बनाया गया, जहाँ गुरु हरी किशन जी कभी रुके थे। चार अन्य गुरुद्वारे यमुना के घाटों के समीप बनाये गए थे। मजनू का टीला और मोतीबाग में भी दो गुरूद्वारे बनवाये और उनके साथ स्थिर आय वाली संपत्ति भी जोड़ी। गुरु तेग बहादुर जी की स्मृति से जुड़े दो स्थल दिल्ली में थे। एक कोतवाली जहाँ गुरु जी का बलिदान हुआ था। दूसरा रकाबगंज जहाँ लखी बंजारा और उनके लड़के ने जान पर खेलकर उनके सर विहीन शव का अंतिम संस्कार किया था। इन दोनों स्थानों पर मुसलमानों ने मस्जिद बना ली थी। बघेल सिंह ने पहले रकाबगंज पर अपना ध्यान लगाया। स्थानीय मुसलमानों में मस्जिद हटाने की घोषणा की तीव्र प्रतिक्रिया हुई। उन्होंने मुग़ल बादशाह से इसके विरुद्ध याचिका डाली। उनका प्रस्ताव था कि चाहे पूरी दिल्ली जल कर खाक हो जाये पर ये मस्जिद नहीं हटनी चाहिए। मुग़ल बादशाह ने कहा की उन्हें यह प्रस्ताव पहले लेकर आना चाहिए था और वो सिख जनरल से इस विषय में चर्चा करेंगे। बघेल सिंह के अधिकारी ने सूचना दी कि 1 अक्तूबर 1778 को मुसलमानों ने बादशाह को विश्वास में लेकर गुरुद्वारा को तोड़ा था। बघेल सिंह ने मिलने के लिए मुसलमानों के समूह को बुलाया जिसमें मुल्ला-मौलवी शामिल थे। उन सभी की सूची बनवाई। उनकी सबकी सम्पत्तियों की सूची बनवाई और उन्हें जब्त करने के लिए अपने घुड़सवार भेज दिए। उन्हें एक हफ्ते बाद मिलने के लिए बुलाया। उन्हें जब अपनी गंगा के दोआब में स्थित संपत्ति पर बघेल के घुड़सवार चढ़ते दिखे तो उनके होश उड़ गए। वे भागे भागे बघेल जनरल से समझौता करने आये। बघेल सिंह ने उनसे लिखित रूप में मस्जिद हटाने का प्रस्ताव ले लिया। उस प्रस्ताव को बादशाह के पास भेज दिया और मस्जिद तोड़ने के लिए अपने योद्धा भेज दिए। आधे दिन में 2000 घुड़सवारों ने मस्जिद की एक ईंट भी वहां न छोड़ी। गुरुद्वारा की नींव रखी गई ,गुरुबाणी का पाठ हुआ और कड़ा प्रसाद का वितरण हुआ। अब गुरुद्वारा शीशगंज की बारी थी। बघेल सिंह ने सिखों को एकत्र किया। मुस्लिम जनसमूह बादशाह और मुल्ला मौलवियों को दरकिनार कर इकट्ठा हो गया। उन्होंने सिखों से लोहा लेने का मन बना लिया था। एक पानी पिलाने वाली मशकन ने वह स्थान बघेल सिंह को बताया जहाँ पर गुरु जी का बलिदान उसके पिता के सामने हुआ था। उसके अनुसार हिन्दू फकीर पूर्व दिशा की ओर मुख किये मस्जिद की चारदीवाली के भीतर एक चौकी पर विराजमान थे। जब जल्लाद ने उन पर अत्याचार किया था। बादशाह के अधिकारी भी आ गए। उन्होंने मुसलमानों को यह विश्वास दिलाया कि मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जायेगा। केवल उसकी चारदीवारी को तोड़ा जायेगा। वही हुआ। चारदीवारी गिराई गई। मस्जिद के प्रांगण में गुरुद्वारा की स्थापना हुई। यही गुरुद्वारा आजकल गुरुद्वारा शीशगंज कहलाता हैं।
जनरल बघेल सिंह ने इतिहास में वो कारनामा कर दिखाया। जो कोई नहीं कर पाया। सिख संगत जनरल बघेल सिंह की दिल्ली विजय की बात तो करती है पर उनकी इस कूटनीतिक और रणनीतिक विजय की कोई चर्चा नहीं की जाती। ( हरी राम गुप्ता, भाग 3, पृ. 168-169)



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