* सृष्टि का धारक परमात्मा और उसकी उपासना का संदेश •
* सृष्टि का धारक परमात्मा और उसकी उपासना का संदेश •
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येन द्यौरुग्रा पृथिवी च दृढा येन स्वः स्तभितं येन नाकः।
योऽअन्तरिक्षे रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
-- यजुर्वेद : अध्याय 32, मंत्र 6
अर्थ : (येन) जिस परमात्मा ने (उग्रा) तीक्ष्ण स्वभाव वाले (द्यौः) सूर्य आदि (च) और (पृथिवी) भूमि को (दृढा) धारण, (येन) जिस जगदीश्वर ने (स्वः) सुख को (स्तभितम्) धारण, और (येन) जिस ईश्वर ने (नाकः) दुःखरहित मोक्ष को धारण किया है, (यः) जो (अन्तरिक्षे) आकाश में (रजसः) सब लोकलोकान्तरों को (विमानः) विशेष मानयुक्त अर्थात् जैसे आकाश में पक्षी उड़ते हैं, वैसे सब लोकों का निर्माण करता और भ्रमण कराता है, हम लोग उस (कस्मै) सुखदायक (देवाय) कामना करने के योग्य परब्रह्म की प्राप्ति के लिये (हविषा) सब सामर्थ्य से (विधेम) विशेष भक्ति करें। (महर्षि दयानंद कृत संस्कारविधि)
अर्थ-चिंतन : यह वेदमंत्र परमात्मा की महान शक्ति, सर्वव्यापकता और उसकी उपासना के महत्त्व को अत्यन्त सुंदर ढंग से प्रस्तुत करता है। इसमें बताया गया है कि यह सम्पूर्ण सृष्टि - आकाश, पृथ्वी, सूर्य, सुख और मोक्ष - सब उसी एक परमात्मा के द्वारा धारण और संचालित हैं। अतः मनुष्य को उसी परमात्मा की भक्ति करनी चाहिए।
मंत्र की शुरुआत “येन” शब्द से होती है, जिसका अर्थ है - जिसके द्वारा। यहाँ बार-बार यह बताने का प्रयत्न किया गया है कि सृष्टि की प्रत्येक वस्तु का आधार वही परमात्मा है। “द्यौः उग्रा” का अर्थ है - तीक्ष्ण तेज वाला सूर्य आदि। सूर्य अत्यन्त प्रचण्ड और शक्तिशाली है, परन्तु वह भी परमात्मा की व्यवस्था से ही स्थिर है। “पृथिवी च दृढा”- यह पृथ्वी जो इतनी विशाल है, वह भी उसी परमात्मा के द्वारा धारण की गई है। इससे स्पष्ट होता है कि संसार की कोई भी उत्पन्न हुई वस्तु (कार्य-पदार्थ) अपने आप में स्वतन्त्र नहीं है, सब परमात्मा पर आश्रित हैं।
आगे कहा गया है - “येन स्वः स्तभितम्” अर्थात् जिस परमात्मा ने सुख को धारण किया है। यहाँ “स्वः” का अर्थ केवल स्वर्ग नहीं, बल्कि सुख और कल्याण की अवस्था है। संसार में जो भी सुख हमें प्राप्त होता है, वह उसी परमात्मा की व्यवस्था का परिणाम है। इसी प्रकार “नाकः” शब्द का अर्थ है - दुःखरहित अवस्था अर्थात् मोक्ष। “येन नाकः स्तभितम्” - जिस परमात्मा ने मोक्ष को धारण किया है, वही मनुष्य को अंतिम मुक्ति प्रदान करने वाला है।
इसके बाद मंत्र कहता है - “योऽअन्तरिक्षे रजसो विमानः”। इसका अर्थ है - जो परमात्मा अन्तरिक्ष में सभी लोकों और उनके मध्य के स्थानों का निर्माण करता है और उन्हें व्यवस्थित रूप से चलाता है। जैसे आकाश में पक्षी स्वतंत्र रूप से उड़ते हैं, वैसे ही परमात्मा इस ब्रह्माण्ड के असंख्य लोकों का संचालन करता है, उन्हें भ्रमण कराया है। वह सबका नियन्ता है, सभी जीवों पर समान रूप से दृष्टि रखता है और सबको उनके कर्मों के अनुसार गति देता है, यथायोग्य फल देता है।
यहाँ “विमानः” का अर्थ है - विशेष रूप से मानयुक्त करके व्यवस्थित करने वाला, संचालित करने वाला। इससे यह सिद्ध होता है कि यह संसार किसी संयोग (chance) का परिणाम नहीं, बल्कि एक महान् चेतन सत्ता - परमात्मा - की सुनियोजित रचना है। वह न केवल सृष्टि का निर्माण करता है, बल्कि उसे निरन्तर चलाता भी है।
मंत्र के अंतिम भाग में कहा गया है - “कस्मै देवाय हविषा विधेम” अर्थात् हमारे लिए वही सुखदायक परमात्मा कि जिसने इस समस्त सृष्टि को धारण किया है, उपासना के योग्य है।
“हविषा विधेम” का अर्थ है - हम अपनी सम्पूर्ण शक्ति, श्रद्धा और साधनों के साथ उस परमात्मा की भक्ति करें। यहाँ “हविषा” केवल यज्ञ की आहुति नहीं है, बल्कि अपने जीवन की श्रेष्ठ शक्तियों - समय, परिश्रम, ज्ञान और भावनाओं - को परमात्मा की उपासना में समर्पित करना है।
इस मंत्र का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य को यह समझना चाहिए कि संसार की प्रत्येक वस्तु परमात्मा पर निर्भर है। इसलिए किसी अन्य वस्तु या शक्ति को सर्वोच्च मानने के बजाय उसी एक परमात्मा को स्वीकार करना चाहिए। वही सच्चा सुखदाता है, वही मोक्षदाता है, और वही सम्पूर्ण जगत् का आधार है।
जब मनुष्य इस सत्य को समझकर परमात्मा की भक्ति करता है, तो उसका जीवन सही दिशा में आगे बढ़ता है। उसके भीतर विनम्रता, कृतज्ञता और सत्य के प्रति निष्ठा उत्पन्न होती है। वह अपने कर्तव्यों को ठीक प्रकार से निभाता है और अंततः शांति एवं आनंद को प्राप्त करता है।
इस प्रकार यह वेदमंत्र हमें सिखाता है कि सृष्टि के महान् रहस्य को समझकर हमें उस एक परमात्मा की उपासना करनी चाहिए, जो सबका धारक, नियन्ता और कल्याणकर्ता है।
-- भावेश मेरजा
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